Category Archives: महानगर

चुभन, टूटते सपनो के किरचों की

अपना तकिया,अपना बिस्तर अपनी  दीवारें…और अपना खाली-खाली  सा कमरा…जिसने पूरे चौबीस साल तक उसकी हंसी-ख़ुशी-गम -आँसू सब देखे थे. उसके ग़मज़दा होने पर  कभी पुचकार कर अंक में भर लेता , कभी शिकायत करता ,इतना बेतरतीब क्यूँ रखा है तो … Continue reading

Posted in कहानी, दो बहनें, महानगर | 34s टिप्पणियाँ