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Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 1 टिप्पणी

हमारी कॉलोनी के काका

उम्र के इस मोड़ पर भी….किसी को नमस्ते कहती हूँ…और वे आशिर्वादस्वरूप मेरी हथेली पर कभी कोई टॉफी..लेमनचूस…खट्टी-मीठी गोलियाँ तो कभी दो बेर रख देते हैं. मेरे ये कहने पर…”क्या काका….हम बच्चे थोड़े ही हैं…” वे मुस्कुरा कर कहते हैं….”अरे खा लो”..या फिर कहते हैं…”बच्चों को दे देना” . ये हैं हमारी कॉलोनी के काका. उनकी जेबें हमेशा इन चीज़ों से भरी रहती है…और बच्चों को ..रुक कर उनसे दो बातें करने वालों की हथेली पर वे कुछ रखना कभी नहीं भूलते.  इनका नाम है, ‘श्रीनिवास रा. तलवलकर’ . सत्तासी (87 ) वसंत देख चुके औसत कद के दुबले-पतले पर स्फूर्तिवान काका सुबह साढ़े छः बजे ऑटो के  इंतज़ार में खड़े मिलते  हैं. रोज, सुबह की चाय पी वे ऑटो ले लाइब्रेरी जाते हैं. सीनियर सिटिज़न की लाइब्रेरी की चाबी उनके पास ही रहती है. लाइब्रेरी में छः अखबार आते हैं…उनपर स्टैम्प लगाते हैं. पत्रिकाओं को करीने से रखते हैं. लोगो से मिलजुलकर वे घर लौटते हैं. नाश्ता कर, लेखन कार्य करते हैं. फिर खाना खाकर थोड़ा आराम और दो बजे से वे बच्चों को मराठी पढ़ाने के लिए निकल पड़ते हैं.


मुझसे भी काका की पहचान इसी क्रम में हुई. जब मेरा बड़ा बेटा किंजल्क चौथी कक्षा में गया उसके पाठ्यक्रम में एक नया विषय जुड़ गया, ‘मराठी’. मैने सोचा, लिपि देवनागरी है…थोड़ी-बहुत समझ में आ ही जाती है. मैं उसे पढ़ा लूंगी . एक दिन मैं उसे एक कविता में  समझा रही थी ,”तूप रोटी खा’…का अर्थ है..”दूध रोटी खा’ और पोछा लगाती मेरी काम वाली बाई ने कहा…’नहीं भाभी ‘तूप’ का मतलब होता है..’घी’ यानि ‘घी रोटी खा’…ऐसे ही एक दिन एक पाठ में  “गवत काढतो” का अर्थ मैं समझाने लगी…कि ‘कुछ लोग..पेड़ के नीचे बैठ..गप्पे हांक रहे थे .’…फिर से मेरी बाई ने सुधारा…”गवत काढतो’ का अर्थ ‘गप्पे हांकना’ नहीं……’घास निकालना’ है. अब मुझे चिंता हुई…ऐसे तो मेरा बेटा फेल हो जाएगा…एक सहेली से चर्चा की और उसने ‘काका’ के बारे बताया…और काका ने मेरे दोनों बेटों को इतनी अच्छी मराठी की शिक्षा दी कि बोर्ड में किंजल्क को ८६ और कनिष्क को ८१ नंबर मिले…अफ़सोस बस ये रहा  कि हिंदी में कम मिले..:(..आज काका की शिक्षा के बदौलत दोनों इतनी धाराप्रवाह मराठी बोलते हैं कि ट्रैफिक पुलिस…कुली वगैरह हमें भाव ही नहीं देते, मेरे बेटों से ही बात करते हैं. 

हमारी कौलोनो के ज्यादातर बच्चों को काका ने ही मराठी पढाया है. और गौर करने की बात ये है कि काका, शिक्षक नहीं हैं. वे पोस्टमास्टर के पद से रिटायर हुए हैं. मराठी साहित्य पढना-पढ़ाना उनका शौक है. उन्हें लिखने का भी शौक है और अक्सर अखबारों में पत्रिकाओं में उनके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं. वे हमेशा कहते हैं, मुझे जो पेंशन मिलती है…उसमे मेरा खर्च निकल आता है…लेकिन मैं चाहता हूँ…ज्यादा से ज्यादा लोग मराठी पढना-लिखना सीखें. इसीलिए काका को पैसे  का भी आकर्षण नहीं. आज के युग में ,घर पर आ कर पढ़ाने का वे मात्र दो सौ रुपये लेते थे. मैने और मेरी सहेली ने उनसे जबरदस्ती ये राशि तीन सौ रुपये करवाई. पर काका संकोचवश किसी से पैसे के लिए नहीं कहते और कई लोग इसका फायदा उठा…उन्हें समय पर पैसे नहीं देते या फिर कम देते हैं…काका फिर भी कुछ नहीं कहते. पर जब कई लोग उन्हें मान-सम्मान नहीं देते तो उन्हें जरूर दुख होता. कई घरों में माता-पिता नौकरी पर होते..और बच्चे अकेले घर पर,रहकर अपनी मनमानी करते…..जब भी मैं चाय लेकर जाती…काका ये सब बातें शेयर करते…बातों -बातों में काका के जीवन के पन्ने भी खुलते चले जाते…मुश्किल , बस ये होती कि बातें करते काका भूल जाते कि मुझे मराठी नहीं आती और वे हिंदी से कब मराठी में स्विच कर जाते,उन्हें भी पता नहीं चलता. जो बातें समझ नहीं आती मुझे बाद में बच्चों से पूछना पड़ता.

काका की जीवन-कथा भी कम दिलचस्प नहीं. उनका जन्म ३० जुलाई १९२४ को महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के अक्कलकोट नामक गाँव में हुआ. काका दस भाई बहन में सबसे बड़े थे. थे. घर में बहुत गरीबी थी. काका पढ़ने में बहुत तेज थे.पर उनके गाँव में उस वक्त सिर्फ प्राइमरी स्कूल ही था.  उनके पिताजी के रिश्ते की एक बहन उन्हें आगे पढ़ने के लिए अपने गाँव लेकर गयी. वहाँ काका सात दिनों में सात घर में खाना खाया करते थे और सबका काम कर देते थे. इस तरह से उन्होंने मैट्रिक तक की शिक्षा प्राप्त की. उसी वक़्त उनके पिताजी  गुजर गए. काका को सोलापुर में राशनिंग ऑफिस में चालीस रुपये के वेतन पर नौकरी मिली. बीस रुपये वे घर भेज देते थे..दस रुपये खुद के लिए रखते  थे और दस रुपये अपनी नानी को भेजते थे. इसके बाद उन्हें अहमदनगर में पोस्ट ऑफिस में इकसठ  रुपये के वेतन  पर दूसरी नौकरी मिली. घर के हालात सुधरने लगे. छोटे भाई-बहन पढ़ने लगे. बहनों की शादी भी  कर दी. काका की शादी १९४५ में हुई. महाराष्ट्र में ही उनके तबादले होते रहे. कई बार नौकरी में उनके सीधेपन  का फायदा उठा..उनके सहकर्मियों ने उन्हें धोखा भी दिया…फिर भी काका का बहुत ज्यादा नुकसान नहीं कर पाए वो.

अपने झोले में से मेरे लिए कोई हिंदी पत्रिका ढूंढते हुए 
१९८२ में काका रिटायर होकर बॉम्बे आ गए क्यूंकि उनके सारे भाई-बहन बॉम्बे में ही थे. काका के बड़े लड़के की नौकरी भी बॉम्बे में ही थी. काका के दो पुत्र और एक पुत्री हैं. पर काका,काकी के साथ अकेले ही रहते हैं.   हमारे समाज के हर वृद्ध की तरह काका की कहानी भी अलग नहीं है. उनके बड़े बेटे काका के घर से कुछ ही दूरी पर रहते हैं. परन्तु माता-पिता के पास बिलकुल ही नहीं आते-जाते. हाल में ही काका ने बहुत दुखी होकर बताया कि उनके बेटे की पचासवीं वैवाहिक वर्षगाँठ थी..क्लब में बड़ी सी पार्टी दी..परन्तु माता-पिता को कोई सूचना या आमंत्रण नहीं मिला. उनकी बिल्डिंग के लोग…आस-पड़ोस ही अब उनका परिवार है.

काका मराठी साहित्य के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं. अभी हाल में ही उनकी लिखी मराठी लोक कथाओं की एक पुस्तक प्रकाशित हुई है. परन्तु मराठी प्रकाशन की स्थिति भी हिंदी प्रकाशन से इतर नहीं है. इस पुस्तक के प्रकाशन में काका के सत्रह हज़ार रुपये खर्च हो गए. बड़े मन  से हर जान-पहचान वालों को काका ने वो पुस्तक भेंट की. अभी काका एक दूसरी पुस्तक के प्रकाशन की तैयारी में लगे हुए हैं. कहते हैं…कुछ एरियर्स मिलने वाले हैं…उन पैसों को इनमे लगा दूंगा. जब बच्चों को पढ़ाने आते थे…अक्सर काका किसी पत्रिका में छपे अपने किसी आलेख की चर्चा करते. एक  दिन मैने यूँ ही पूछ लिया…”काका आपको..कुछ पारिश्रमिक भेजते हैं ..वे लोग”?…काका ने कहा…’ नहीं..वे पत्रिका ही भेज देते हैं…{आज मेरे साथ भी ऐसा ही होता है…पारिश्रमिक की जगह मैं पत्रिका पाकर ही खुश हो जाती हूँ..:)}

काका कोई भगवान तो हैं नहीं…एक आम इंसान हैं…इसलिए इंसान जनित कमजोरियां उनमे भी हैं. वे घर में बिलकुल ही नहीं टिकते. घर से बस सोने खाने -लिखने-पढ़ने का ही सरोकार रखते हैं. खाली वक़्त में अक्सर गेट के पास रेलिंग पर बैठे होते हैं. हमेशा कहते हैं..”घर में काकी किट-पिट करती है…इसलिए घर में रहने का नई…बस पैसे काकी के हाथों में रख देता हूँ…” अब इतने बुजुर्ग हैं..उनसे कैसे कहूँ..”काकी को भी तो इस उम्र में साथ चाहिए…कोई बोलने- बतियाने वाला चाहिए…आप सारा दिन घर से बाहर रहेंगे तो वे किट-पिट तो करेंगी ही. ” कई बार अपनी झुकी कमर के साथ काकी…किसी बाई के साथ…अकेली दुकान में खरीदारी करती हुई दिख जाती हैं.

परन्तु काका सही मायनों में एक कर्मयोगी हैं. और सबसे अच्छी बात…उन्हें शुगर…ब्लड- प्रेशर..कोलेस्ट्रौल ..किसी तरह की कोई बीमारी नहीं.  मेरे बच्चों का कैरियर अभी शुरू भी नहीं हुआ..पर वे काका को देखकर कहते हैं…” अपनी रिटायर्ड लाइफ तो बिलकुल काका की तरह जीनी है”
काका, मराठी साहित्य'श्रीनिवास रा. तलवलकर', संस्मरण, kaka में प्रकाशित किया गया | 36 टिप्पणियाँ

ज़री बौर्डर पर काले धब्बे

जब सिवकासी में पटाखे बनाने वाले बाल-मजदूरों पर एक पोस्ट लिखी थी….उसके बाद ही ‘ज़री उद्योग’ में लगे  बच्चों के विषय में भी लिखने की इच्छा थी…खासकर इसलिए भी कि कई लोगों का बाल-श्रम के सन्दर्भ में कहना है कि इस से बच्चों का पेट भरता है..वे परिवार की मदद कर पाते हैं…उनका दिमाग पूरी तरह विकसित हो चुका होता है…इसलिए उनका काम करना उचित है…अब शायद उन्हें पता नहीं कि किस तरह के हालातों में ये लोग काम करते हैं…या फिर इस तरह उनका काम करना उन्हें स्वीकार्य है या फिर वे उनकी दशा के सम्बन्ध में आँखें मूँद लेना चाहते हैं. 


अक्सर अखबारों में खबरे आती हैं… फलां ज़री यूनिट से इतने बच्चे पकडे गए. ज़री यूनिट का मालिक फरार हो जाता है..और बच्चे अपने माता-पिता के पास गाँव भेज दिए जाते हैं, लेकिन तबतक दूसरे गाँवों से दूसरे बच्चों को….किसी गलीचे-बीडी – ईंटें -पटाखे’ उद्योग के बिचौलिए बहला-फुसला कर उनके माता-पिता को उनके अच्छे भविष्य का लालच देकर शहर ले आते हैं और कई शिक्षित-समझदार लोग भी इसे उचित समझते हैं कि बच्चे का पेट तो भर रहा है…और वो गाँव में दर-दर की ठोकरें तो नहीं खा रहा.

मुंबई-दिल्ली-सूरत-कलकत्ता..करीब करीब  हर बड़े शहर में कपड़ों पर ज़री की कढाई का काम किया जाता है और ज्यादातर बच्चे ही इस कढाई के  के काम में लगे होते हैं. केवल दिल्ली में ही 5000-7000 ज़री यूनिट्स हैं..और हर यूनिट में ४० के करीब बच्चे काम करते हैं. बिहार-झारखंड-नेपाल-यू.पी-छत्तीसगढ़ -आंध्र प्रदेश के गाँवों में ‘ज़री यूनिट’ चलाने वालों के एजेंट घूमते रहते हैं और गरीब माता-पिता को यह दिलासा देकर कि शहर में वो काम करके पैसे भी कमा सकेगा और पढ़ाई करके एक अच्छी जिंदगी जी सकेगा’ इन बच्चों को शहर ले आते हैं. ज्यादातर बच्चे यू.पी. के आजमगढ़ और रामपुर एवं बिहार के सीतामढ़ी और मधुबनी जिले से आते हैं. कई बच्चों ने अपने जीवन के आठ बसंत भी नहीं देखे होते और इन एजेंट के हाथों अपना बचपन..अपनी हंसी- ख़ुशी सब गिरवी रख देते हैं, सिर्फ दो सूखी रोटी के एवज में. क्यूंकि अक्सर काम सिखाने की बात कहकर इन बच्चों को पैसे भी  नहीं दिए जाते. सालो-साल ये सिर्फ काम ही सीखते रह जाते हैं.

दस बाई दस के कमरे में जिसमे एक पीला बल्ब जलता रहता है….कोई खिड़की नहीं होती ..कहीं कहीं चालीस बच्चे एक साथ रहते हैं. ये बच्चे अठारह घंटे काम करते हैं. कमरे के ही एक कोने में बाथरूम होता है और दूसरा कोना….किचन का काम करता है.जहाँ बारी-बारी से ये बच्चे ही खाना बनाते हैं. खाने में सिर्फ चावल और दाल होता है. इन्हें कभी बाहर जाने की इजाज़त नहीं होती. बीमार पड़ने पर डॉक्टर के पास नहीं ले जाया जाता और बीमारी गंभीर हो जाने पर किसी रिश्तेदार को बुला सौंप दिया जाता है…कई बच्चे हॉस्पिटल भी नहीं पहुँच पाते और दम तोड़ देते  हैं. बच्चों को चोटों के साथसाथ spinal injuries  तक रहती है.

११ साल का सलीम बिहार के दरभंगा जिले से है और मुंबई के धारावी की एक ज़री यूनिट में सुबह आठ बजे से आधी रात तक काम करता है . दो साल हो गए हैं उसे काम करते पर अभी तक उसे उसकी पहली तनख्वाह नहीं मिली है,क्यूंकि वो अभी काम सीख रहा है. ज़री यूनिट में काम करने वाले तीन भाग में बंटे होते  हैं, शागिर्द, कारीगर और मालिक. सारे बच्चे शागिर्द की कैटेगरी में आते हैं. जो कढाई  सीखने के साथ-साथ , साफ़-सफाई, खाना बनाना, मालिक और कारीगर लोगो के पैर दबाना ..मालिश करना..सब करते हैं..और क्या क्या करवाए जाते होंगे….ये कोई भी कल्पना कर सकता है.

ज़री यूनिट से छुडाये गए बच्चे अपनी कहानी बताते हैं. दस साल के बज्यंत कुमार की माँ को एक एजेंट ने अप्रोच किया और अच्छी नौकरी का लालच दे शहर ले आया. आठ साल  के श्याम और दस साल के गोविन्द  के पिता ने उस एजेंट से दो हज़ार रुपये क़र्ज़ लिए थे . नहीं चुकाए जाने की दशा  में पिता ने अपने दोनों बच्चे उसके हवाले कर दिए .( क़र्ज़ …इसी मंशा से दिया ही गया होगा कि वो चुका ना पाए और फिर उसके दोनों बच्चे उठा लिए जाएँ.) दोनों के बाल शेव कर दिए गए. ताकि इनके पसीने से काम खराब ना हो. दिल्ली की ४२ डिग्री टेम्परेचर में सिर्फ अंडर पैंट पहने ये बच्चे बिना किसी खिड़की वाले कमरे में बिना किसी पंखे के १४ से १८ घंटे तक काम करते हैं. दो साल हो गए उन्हें एक पैसा भी नहीं दिया गया और ना ही वे अपने घर गए.  दस साल के सादिक राम का कहना  है,” जब हमलोग बहुत थक जाते थे  तो हमें पीटा जाता था ..और अगरबत्ती से हाथ जला दिए जाते थे.’ ग्यारह साल का हसन छः साल से काम कर रहा है…यानि कि जब उसने शुरुआत की होगी वो सिर्फ पांच साल का होगा. पिछले तीन साल से वो घर नहीं गया. “नौ साल के अजय कुमार ने बताया कि ,’मारकर उसका हाथ फ्रैक्चर कर दिया गया’ दस साल के कमलेश कुमार के पीठ पर चाक़ू के कई ज़ख्म देखने को मिले.’ गलती होने पर मालिक और कारीगर बच्चों के बाल तक उखाड़ लेते थे. और लिखना मुश्किल हो रहा है. हर बच्चे के पास ऐसी एक कहानी है. अखबारों में पत्रिकाओं में…नेट पर….मालिकों के हैवानियत के किस्से बिखरे पड़े हैं. 

तेरह-चौदह की उम्र के बाद तनख्वाह दी भी जाती है तो मुश्किल से 200 रुपये और फिर  सिर्फ एक समय का ही  खाना दिया जाता है. अगर कढाई करते सूई टूट जाए तो उन्हें अपने पैसे से सूई खरीदनी पड़ती है. एक सूई बारह रुपये की आती है…और हफ्ते में दो सूई तो टूटती ही है. लिहाज़ा कई-कई दिन उन्हें चाय-बिस्कुट भी नसीब नहीं होता और भूखे पेट काम करना पड़ता है.

कई NGO  1998 से ही इन बच्चों को इस दोज़ख से निकालने में लगे हुए हैं…’प्रथम’ ..BBA  (बचपन बचाओ आन्दोलन.)… इनमे प्रमुख हैं. इन बच्चों की  स्थिति में सुधार लाने की कोशिश भी की जाती है. NGO ‘प्रथम’ ने मालिकों से आग्रह किया कि वे बस काम से आधे  घंटे का ब्रेक दें…उस ब्रेक में वे बच्चों को पढ़ना चाहते  हैं. कुछ ज़री यूनिट के मालिक मान गए. उसी कमरे में उन्हें पढाया जाता है. नौ साल का ‘मोहम्मद हकील’ बार बार अपना नाम  स्लेट पर लिखता और मिटाता है. पढ़ाई उसके लिए एक खेल है…क्यूंकि उसे काम से कभी कोई छुट्टी ही नहीं मिली कि कोई खेल  खेल सके .

ये हालात सिर्फ ज़री यूनिट में काम करने वाले बच्चों के ही नहीं है….हर उद्योग से जुड़े, बाल मजदूर का यही हाल है. इन बच्चों के पेट में दो रोटी पहुँच जाती है और ये सडकों पर नहीं सोते. कहीं कहीं उनके माता-पिता को कुछ रुपये भी मिल जाते होंगे. तो क्या हमें संतुष्ट हो जाना चाहिए?? लोग शिकायत करते हैं कि गलीचे बनाने का काम बंद करवा कर गलत किया गया…क्यूंकि उन नन्ही उँगलियों से बने गलीचों की विदेशों में बहुत मांग थी. इसे सिर्फ ह्रदयहीनता ही कहा  जा सकता है और कुछ नहीं.

जो लोग बाल श्रम को सही मानते हैं….वे कभी उसका उजला पक्ष भी दिखाएँ.
( सभी चित्र गूगल से साभार )
ज़री यूनिट, बाल श्रम, बाल-मजदूरों, सिवकासी में प्रकाशित किया गया | 50 टिप्पणियाँ

परकटे नन्हे परिंदे

रचना जी ने अपनी पोस्ट में ‘बाल मजदूरी’ के मुद्दे पर चर्चा की है…पहले भी मैने इस विषय पर लिखा है…और आज भी  मन में कुछ सवाल सर उठा रहे हैं…आखिर, बच्चे अपने खेलने-कूदने ..पढ़ने-लिखने के दिनों में ये सोलह घंटे का श्रम और अमानवीय स्थिति में जिंदगी गुजारने को क्यूँ मजबूर हो जाते हैं?


उन्हें काम पर रखने वाले दोषी हैं…तो क्या उनके माता-पिता का कोई दोष नहीं जो उन्हें इस कच्ची सी उम्र में काम के बोझ तले दब जाने को मजबूर कर देते हैं?? गरीबी एक बहुत बड़ा कारण तो है ही…पर उस से भी ज्यादा मुझे लगता है…उनके बीच जागरूकता की कमी…और पढ़ने-लिखने की सुविधा का अभाव भी एक वजह  है.

कई बार गाँव के गरीब लोग अपने बच्चों को नौकर के रूप में इसलिए रखवाते  हैं कि वो एक अच्छे परिवार के संसर्ग में रहेगा. मैने खुद देखा है…कितनी ही बार लोग खुद अपने बच्चे को लेकर आते थे और कहते थे..’सारा दिन सडकों पर  बाग़-बगीचों में घूमता रहता है…आपलोगों के साथ रहकर कुछ सीख जाएगा” खैर, मैं ये नहीं कहती कि इसके पीछे पैसों का लालच नहीं होगा…लेकिन माता-पिता की ये चिंता भी रहती है कि…ये गाँव में खाली बैठा अपना समय बर्बाद कर रहा है. अगर गाँवों में बच्चों के स्कूल जाने की व्यवस्था हो….स्कूल में शिक्षक हों..और वहाँ सचमुच पढ़ाई होती हो. बच्चों के माता-पिता को ये विश्वास दिलाया जाए कि बच्चा-पढ़ लिख कर आपसे बेहतर जिंदगी जी सकेगा..उनके सामने ऐसा कोई उदाहरण भी हो ..जहाँ उनके बीच का कोई बच्चा पढ़-लिख कर अच्छी जिंदगी बसर कर रहा हो  तो ये तस्वीर बदल सकती है. और अगर सरकार की mid day meal की व्यवस्था सुचारू रूप से कार्यान्वित की जाए तो इस समस्या का शत प्रतिशत हल निकल सकता  है.

गरीब लोग सिर्फ गाँव में ही नहीं..शहर में भी हैं. मुंबई की झुग्गी झोपड़ियों में गाँव से आकर ही बसे हुए हैं . मानव-स्वभाव की तरह लालच इनमे भी होगा…ये भी अपने बच्चे को काम पर लगा पैसे पाने की सोचते होंगे. पर इनकी सोच में बदलाव आ चुका है. यहाँ, ज्यादातर सब अपने बच्चों को स्कूल में पढ़ाने की कोशिश करते हैं. बच्चों के लिए ट्यूशन रखते हैं…अगर उनकी पढ़ने में रूचि रही और उन्होंने अच्छा रिजल्ट लाया तो उन्हें कॉलेज में भी पढ़ाते हैं. क्यूंकि उनमे ये जागरूकता आ चुकी है कि बच्चे अगर पढ़-लिख गए तो उनकी जिंदगी संवर जायेगी . यहाँ ,बच्चों को स्कूल की सुविधा है….जहाँ पढ़ाई भी होती है.

मनुष्य गरीब हो या अमीर..हमेशा अपनी संतान के लिए एक अच्छी जिंदगी का सपना देखता है..अपवाद हो सकते हैं..पर हर गरीब अपने बच्चों को सिर्फ धनोपार्जन का एक जरिया नहीं समझता. अगर उनके सामने बेहतर विकल्प रखे जाएँ तो वे कभी अपने बच्चों से किसी भी किस्म  की मजदूरी करवाने को तैयार नहीं होंगे.

लेकिन सारी सरकारी योजनायें कागजों पर ही रह जाती हैं या फिर सिर्फ नाम के लिए इनका कार्यान्वयन होता है. कितने ही स्कूल कागज़ पर ही हैं…उस स्कूल में बच्चों का भी जिक्र रहता है और शिक्षक हर महीने तनख्वाह भी ले जाते हैं. ‘मिड डे मील’ की व्यवस्था है..पर बच्चों को खाने में कंकड़-पत्थर..कीड़ों से भरे चावल दिए जाते हैं.छात्रवृत्ति की भी योजना है पर पता नहीं सही पात्रों को वो मिलती भी है या समर्थ लोग तिकड़म लगा..वो भी हड़प कर जाते हैं. 

आंकड़े बताते हैं…हमारे देश में,  एक करोड़ से भी ज्यादा बाल श्रमिक हैं. करीब पच्चीस साल पहले ही ‘बाल श्रम ‘के विरुद्ध कानून बन चुका है…पर उस समय से बाल श्रमिकों की संख्या में  १५% की वृद्धि ही हुई है. बाल श्रम के विरुद्ध कानून बना कर कुछ नहीं किया जा सकता…जब तक गाँवों को विकसित नहीं किया जाएगा…वहाँ भरण-पोषण और पढ़ने -लिखने की सुविधा नहीं मुहैया करवाई जायेगी…ये बाल मजदूरी का कलंक हमारे समाज के माथे पर विद्यमान रहेगा.
'बाल मजदूरी', 'मिड डे मील' में प्रकाशित किया गया | 28 टिप्पणियाँ

फिल्म ‘मोड़’ : जैसे फिज़ा में एक प्यारी सी धुन

जैसा कि इस ब्लॉग का नाम है….यहाँ बस बातें ही होती हैं…और जब मैं फिल्मो की बातें करती हूँ तो फिर बातों-बातों में लोगो को फिल्म की  कहानी भी पता चल जाती है…और कुछ लोग ऐसा नायाब मौका हाथ से क्यूँ जाने दें…कह डालते हैं..’हमें तो कहानी पता चल गयी’…भले ही उस फिल्म का नाम भी ना सुना हो…और उनके शहर के थियेटर में आने की उम्मीद भी न  हो…

यही वजह थी..जब एक मित्र से फिल्म ‘मोड़’ की प्रशंसा कर रही थी तो उन्होंने कहा…’ इस पर पोस्ट क्यूँ नहीं लिखतीं?’…और मैने मजबूरी जता दी..बेकार ही लोगो को कहने का मौका क्यूँ दूँ….”येल्लो कहानी बता दी’
उन्होंने बड़ी गंभीरता से कहा…’लोग आपकी पोस्ट..आपकी शैली के लिए पढ़ते हैं….आपका  लिखा उन्हें पसंद आता है..” woww..  good  to know कि हमारी कोई शैली  भी है…फिर भी मन मुतमईन नहीं हुआ…जब सहेली से इसकी चर्चा की ….तो उसका भी कहना था…”तुम्हे लिखना चाहिएकई लोगो को इस फिल्म के बारे में तुम्हारी पोस्ट से पता चलेगा..शायद  उनकी रूचि जागे और वे,ये फिल्म देखना चाहें…वगैरह..वगैरह..”
अब मुझे बातें करने के साथ लिखने का भी मर्ज है तो देर काहे  की….हाँ, जिन्हें ऐतराज हो…उनके लिए ये पोस्ट यहीं समाप्त होती है 🙂
जब से नागेश कुकनूर की हैदराबाद ब्लूज़ देखी…उनकी दूसरी फिल्मो का इंतज़ार होने लगा था...डोर .इकबाल..तीन दीवारें…रॉकफोर्ड  ने उनसे उम्मीदें और जगा दीं …पर ‘हॉलीवुड-बॉलिवुड;…’आशायें’ ..बॉम्बे टू बैंगकॉक’ जैसी फिल्मो … ने निराश ही किया…लेकिन उनकी नई फिल्म मोड देखने की इच्छा थी…एक तो इसमें आएशा टाकिया  थीं..और प्रोमोज में ‘पेड़.. झरने.. धुंध से घिरा एक ऊँघता सा पहाड़ी शहर और चश्मा लगाये…सीधे-सादे रणविजय सिंह  और ताजे गुलाब सी खिली आएशा टाकिया को देख..लगा कोई संजीदा सी कहानी जरूर है. ..और उम्मीद के दिए रौशन रहे.
बड़ी प्यारी सी फिल्म है…हकीकत में ऐसा शायद ना होता हो…पर यकीन करने का मन होता है कि हकीकत कुछ ऐसी ही हो..झरने के पास बैठी हार्मोनिका (माउथ ऑर्गन) बजाती ओस की बूँद सी मासूम लड़की और गहरे बादल सा खुद में कई राज़ समेटे गंभीर सा  सीटी में कोई धुन बजाता लड़का. लड़का, गाहे-बगाहे उसे कविता की पंक्तियाँ सुनाता है…लड़की की सुन्दर सी पेंटिंग्स बनाता है …लड़की को सिर्फ एक बेइंतहा प्यार करनेवाला कोई चाहिए…वो लड़के की पर्सनालिटी…बैंक-बैलेंस कुछ नहीं देखती..सिर्फ उसका दिल देखती है. अपनी बुआ के पूछने पर कहती है…”अब तक कोई नहीं मिला…जो सिर्फ मेरे लिए जीना चाहे…”
अरण्या घड़ी रिपेयर करती है..अकेले रहती है. उसके पिता संगीत के उपासक हैं..किशोर कुमार के पुजारी…उनका एक ऑर्केस्ट्रा है…पर शराब की लत भी है..इसी वजह से बेटी ने शर्त रखी है..वे शराब छोड़ने के बाद ही घर में रह सकते हैं…पर बेटी उन्हें प्यार भी बहुत करती है..सुबह-सुबह चाय लेकर,बाहर उठाने  जाती है…रघुवीर यादव ने बहुत ही अच्छी एक्टिंग की है…जब भी मौका मिले वे मासूमियत से पूछ बैठते हैं..’अब,घर आ सकता हूँ..?”
अरण्या के पास एक लड़का रोज अपनी घड़ी रिपेयर करवाने आता है….जबतक अरण्या घड़ी रिपेयर करती है…वह रुपये को मोड़ कर एक ख़ूबसूरत हंस की शक्ल दे देता है..और उसके सामने रख कर चला जाता है…फिर एक दिन कह देता है कि वो उसकी दसवीं कक्षा का सहपाठी ‘एंडी’ है…और उसका बचपन से ही उसपर क्रश है…अपने प्रति उसका यूँ समर्पण देख..अरण्या को भी लगता है..उसे बस उसका ही इंतज़ार था…अरण्या की  बुआ तन्वी आज़मी एक रेस्तरां चलाती हैं,जहाँ अरण्या उनकी मदद करती है…(पर इस  फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि  दक्षिण के एक पहाड़ी शहर में स्थित है….क्यूंकि गाड़ियों के नंबरप्लेट…दक्षिण के हैं…पर उस रेस्तरां में इडली- डोसे की जगह पनीर और दम आलू मिलते हैं :)..अब फिल्म वाले इतना ध्यान थोड़े ही रखते हैं..) जब अरण्या  की बुआ एंडी से मिलने पर कहती है..’यही है तुम्हारा बॉयफ्रेंड ?’  तो वो एंडी  मासूमियत से पूछता है..” सचमुच मैं तुम्हारा बॉयफ्रेंड हूँ..जब चाहे तुम्हारा हाथ पकड़ सकता हूँ…?” {लड़के नोट करें..लडकियाँ पूर्ण समर्पण के साथ..ऐसे भोलेपन पर भी फ़िदा होती हैं :)}
एक दिन अरण्या , उस लड़के को बाज़ार में देखती है..पर उसकी वेशभूषा..चाल-ढाल… बॉडी लेंग्वेज सब अलग होता है…वो आवाज़ देने पर अरण्या  को पहचानता भी नहीं…उसका पीछा करने पर उसे एक मेंटल हॉस्पिटल में जाते हुए देखती है…वहाँ भी वह बेलौस अंदाज़ में वाचमैन से.. नर्स से मजाक करता रहता है. 
अरण्या परेशान होकर पुराने स्कूल में जाकर उसका पता ढूँढने की कोशिश करती है तो पता चलता है..कि दस साल पहले एंडी की मौत हो चुकी है. फिर भी वह उसके घर जाकर उसके माता-पिता से मिलती है…वहाँ वह एंडी की तस्वीर इस लड़के के साथ देखती है…और एंडी की माँ बताती है कि ये अभय है…एंडी का बेस्ट फ्रेंड और एंडी की  मौत से उसके दिमाग पर ऐसा असर पड़ा है कि वह  split  personality  का शिकार हो गया है…वह बीच बीच में एंडी की तरह ही बर्ताव करने लगता है…उसकी तरह का पहनावा वेशभूषा…मेंटल हॉस्पिटल से भागकर उनके घर भी आ जाता है और उन्हें माँ कहकर बुलाता है….बहुत छोटा सा रोल है ‘ एंडी की माँ के रूप में  सफल मराठी अभिनेत्री ‘प्रतीक्षा लोनकर ‘का पर वे एक माँ के दिल की कशमकश बयाँ करने में सफल रही हैं…जहाँ अपने बेटे के रूप में अभय को देख उनके माँ के दिल को सुकून भी मिलता है..वे उन पलों को जीना भी चाहती हैं पर फिर कर्तव्य का ध्यान कर वे डॉक्टर को खबर कर देती हैं…डॉक्टर अरण्या  को देखकर सब कुछ समझ जाते हैं और उसे पूरी हकीकत बताते हैं कि एंडी का अरण्या  पर जबर्दस्त क्रश था..और यह बात उसके बेस्ट फ्रेंड अभय को पता थी…इसीलिए वह जब एंडी के रूप में आता है तो अरण्या  के साथ समय बिताना चाहता है…और चिंता की बात ये है कि आजकल वो ज्यादा से ज्यादा समय एंडी के रूप में ही रहने लगा है. इसलिए अरण्या को उस से मिलना बंद करना होगा.” अरण्या   के सामने ही अभय को दौरे पड़ते हैं…और वह एंडी से अभय के रूप में लौट आता है…( split   personality  विषय पर  Sidney  Sheldon  की एक बहुत ही प्रख्यात पुस्तक है. “If  Tomorrow Comes  ”  इस किताब पर फिल्म भी बनी है….जहाँ नायिका के  अंदर ढेर सारे कैरेक्टर रहते हैं…और वह समय  समय पर उस कैरेक्टर के अनुरूप  ही व्यवहार करने लगती  है) .. अभय, अरण्या  को एंडी की मौत का जिम्मेवार मानता है…अभय  भी मन ही मन अरण्या  को प्यार करता था पर एंडी की तरह कन्फेस नहीं कर पाता  था..इसीलिए उसने मजाक में एंडी से कहा कि तुम्हारे जैसे सीधे-सादे लड़के से अरण्या  प्यार नहीं कर सकती….तुम अपना प्यार साबित करना चाहते हो तो…तो कुछ कर के दिखाओ…उस ऊँचे पत्थर से पानी में कूद जाओ ..और एंडी जब सचमुच कूदने लगता है तो अभय उसे चिल्लाकर बहुत रोकने की कोशिश करता है…पर एंडी कूद  जाता है…और उसकी मौत हो जाती है. यह सब बताते हुए ,अभय बहुत वायलेंट हो जाता है…और उसे अब इलेक्ट्रिक शॉक  दिए जाने लगते हैं. 
आएशा टाकिया, नागेश कुकनूर, रणविजय सिंह 

फिल्म में इस मुद्दे को भी उभारा गया है कि कैसे बड़े बड़े बिल्डर इन पहाड़ी शहरों की खूबसूरती को नष्ट कर बड़े बड़े रिसौर्ट बनाने की कोशिश कर रहे हैं और इसके लिए वहाँ के निवासियों  के घर मुहँ मांगी  कीमत पर खरीद लेते हैं. फिल्म में तो अरण्या और उसकी बुआ एक मुहिम चला कर बिल्डर को वापस जाने पर मजबूर कर देती हैं..पर वास्तविक जीवन में शायद ऐसा ना होता हो.

अब अरण्या  को अभय से प्यार हो जाता है…और वो छुप छुप कर  खिड़की से उसे देखने…उस से मिलने की कोशिश करती है. इलेक्ट्रिक शॉक देने की वजह से अभय मानसिक और शारीरिक रूप से बिलकुल कमजोर हो जाता है…उसकी ये हालत दस साल से उसकी सेवा करने वाली नर्स…अरण्या ..उसके पिता और उसकी बुआ से नहीं देखा जाता और वे सब मिलकर अरण्या को अभय को भगाने में मदद करते हैं.
ट्रेन चल पड़ती है…अभय नासमझ सा बैठा हुआ है..और अरण्या हार्मोनिका निकाल कर बजाने लगती है….अभय के चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट आती है और वो सीटी में एक धुन बजा कर अरण्या का साथ देने लगता है. फिल्म इसी ख़ूबसूरत मोड पर ख़त्म हो जाती है.
फिल्म का छायांकन बहुत ही सुन्दर  है…पहाड़ी शहर के प्राकृतिक दृश्यों को बहुत खूबसूरती से कैमरे में कैद किया गया है. बैकग्राउंड में बजता गीत इतना सटीक है..जैसे ही दर्शकों को लगता है…फलां कैरेक्टर ये सोच रहा होगा…और उसकी सोच गीत की शक्ल में सुनायी देने लगती है. तन्वी आज़मी…रघुवीर सहाय…अनंत महादेवन सारे  मंजे हुए कलाकारों ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है..आयेशा  टाकिया…सुबह की ओस सी मासूम भी लगती हैं…और अभिनय भी लाज़बाब किया है..
पर सबे ज्यादा चौंकाया है. ‘रणविजय सिंह ‘ ने…उनकी पहली फिल्म है, जिसमे इतना लम्बा रोल है…पर वे अपने कैरेक्टर से बिलकुल ही अलग नहीं लगते..एंडी के कैरेक्टर में बिलकुल खामोश से सीधे-सादे लगते हैं..वहीँ अभय के किरदार में आजकल के मॉडर्न युवा. 
दस साल पहले उन्हें  MTv   के कार्यक्रम रोडीज़ वन में देखा था…रोडीज वन जीतने के बाद वे   MTv   में    VJ  भी बन गए…और अब रोडीज़ के ऑडिशन भी लेते हैं…पर इस फिल्म में उनका अभिनय उनके इमेज से हटकर बहुत  ही संवेदनशील रहा. 
नागेश कुकनूर का निर्देशन बहुत ही सधा हुआ है…पर कहीं कहीं स्क्रिप्ट में थोड़ा ढीलापन  है…शायद आजकल के युवाओं में इतना धैर्य ना हो…बिना संवाद के लम्बे दृश्यों को झेलने का.


ये फिल्म ताइवान की फिल्म  CHEN SHUI DE QING CHUN .अर्थात  KEEPING WATCH    पर आधारित है .
आएशा टाकिया, नागेश कुकनूर, फिल्म 'मोड़' : रणविजय सिंह में प्रकाशित किया गया | 32 टिप्पणियाँ

DDLJ : अच्छा है कि ‘राज’ हमारी यादों में जिंदा एक फिल्म किरदार है

आशा है,आप सबकी दीपावली…खुशियों से भरी गुजरी होगी…और दीपों के आलोक ने घर के साथ-साथ आपके जीवन को भी रौशन कर दिया होगा.

मुझे भी आज थोड़ी फुरसत मिली और टी.वी. ऑन किया तो देखा “दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ फिल्म पर एक प्रोग्राम आ रहा था. करीब सोलह साल पहले, दिवाली के दिन ही यह फिल्म रिलीज़ हुई थी..और तब से मुंबई के एक थियेटर ‘मराठा मंदिर’ में अब तक इस फिल्म का शो चल रहा है..पब्लिसिटी स्टंट ही लगती है….थियेटर के मालिक और निर्माता-निर्देशक की जरूर मिली-भगत होगी…वरना सोलह साल से रोज कहाँ से कोई दर्शक मिलता होगा?? (वैसे ये मेरे अपने विचार हैं..सच का पता नहीं) …मन है, एक बार उस थियेटर में जाकर असलियत पता की जाए..पर कोई मेरा साथ नहीं देनेवाला ..और अकेले फिल्म मैं देखती नहीं…इसलिए सच  एक रहस्य ही रह जाएगा :(.  दो साल पहले DDLJ  के चौदह साल पूरे होने पर, ‘अजय ब्रहमात्मज जी’ ने अपने ब्लॉग ‘चवन्नी चैप’ पर इस फिल्म से जुड़े अपने अनुभवों पर कुछ लिखने को कहा था..तभी ये पोस्ट लिखी थी…तो आज मौका भी है..और दूसरे ब्लॉग से अपना लिखा यहाँ पोस्ट करने का दस्तूर भी…सो निभा देते हैं रस्म 🙂



DDLJ  से जुड़ी मेरी यादें कुछ अलग सी हैं. इनमे वह किशोरावस्था वाला अनुभव नहीं है,क्यूंकि मैं वह दहलीज़ पार कर गृहस्थ जीवन में कदम रख चुकी थी. शादी के बाद फिल्में देखना बंद सा हो गया था क्यूंकि पति को बिलकुल शौक नहीं था और दिल्ली में उन दिनों थियेटर जाने का रिवाज़ भी नहीं था.पर अब हम बॉम्बे (हाँ! उस वक़्त बॉम्बे,मुंबई नहीं बना था) में थे और यहाँ लोग बड़े शौक से थियेटर में फिल्में देखा करते थे. एक दिन पति ने ऑफिस से आने के बाद यूँ ही पूछ लिया–‘फिल्म देखने चलना है?'(शायद उन्होंने भी ऑफिस में DDLJ की गाथा सुन रखी थी.) मैं तो झट से तैयार हो गयी.पति ने डी.सी.का टिकट लिया क्यूंकि हमारी तरफ वही सबसे अच्छा माना जाता था.जब थियेटर के अन्दर टॉर्चमैन ने टिकट देख सबसे आगेवाली सीट की तरफ इशारा किया तो हम सकते में आ गए.चाहे,मैं कितने ही दिनों बाद थियेटर आई थी.पर आगे वाली सीट पर बैठना मुझे गवारा नहीं था. यहाँ शायद डी.सी.का मतलब स्टाल था. मुझे दरवाजे पर ही ठिठकी देख पति को भी लौटना पड़ा.पर हमारी किस्मत अच्छी थी,हमें बालकनी के टिकट ब्लैक में मिल गए.



फिल्म शुरू हुई तो काजोल की किस्मत से रश्क होने लगा…सिर्फ सहेलियों के साथ लम्बे टूर पर जाना. साथ-साथ मेरी कल्पना के घोडे भी दौड़ने लगे,काश!हमें भी ऐसा मौका मिला होता तो कितना मजा आता. शाहरुख़ खान के राज़ का किरदार तो जैसे दिल मानने को तैयार नहीं–‘ऐसे लड़के भी होते हैं? एक अजनबी लड़की का इतना ख्याल रखना …आरामदायक कमरा छोड़ इतनी ठंड में बाहर सोना..और उस पर से होंठ सी कर उसकी इक्तनी सारी डांट सुनना …….ना,ऐसा तो सिर्फ फिल्मों में ही हो सकता है’.पर जब उनका टूर ख़तम हो गया तो उनके बीच जन्म लेते नए कोमल अहसास बिलकुल सच से लगे. ‘तुझे देखा तो ये जाना सनम….”इस गीत के पिक्चाराइजेशन ने भी इस अहसास को बड़ी खूबसूरती से उकेरा है. कम ही रोमांटिक गीतों की पिक्ज़राइज्शन अच्छी लगती है..पर इसकी अच्छी लगी..
फिल्म जब पंजाब में काजोल की शादी की तैयारियों तक पहुंची तो ‘राज’ का चेहरा किसी के चेहरे के साथ गडमड होने लगा. वह चेहरा था मेरे छोटे भाई ‘विवेक’ का. बिलकुल ‘राज’ की तरह ही वह उस शादी के घर में बिलकुल अजनबी था. लेकिन छोटे-बड़े, नौकर-चाकर, नाते-रिश्तेदार सबकी जुबान पर एक ही नाम होता था–‘विवेक’
 
विवेक मेरे दूर का रिश्तेदार है,मेरी मौसी के देवर का बेटा…पर है बिलकुल मेरे सगे छोटे भाई सा. मैं छुट्टियों में अपनी मौसी के यहाँ गयी थी,वहीँ विवेक से मुलाक़ात हुई. हम दोनों में अच्छी जम गयी. वह दिन भर मुझे चिढाता रहता और मैं किसी से भी उसका परिचय यूँ करवाती–“ये विवेक हैं,जिनकी विवेक से कभी मुलाक़ात नहीं हुई”
मैं अपने चाचा की बेटी की शादी में गयी थी . विवेक का घर चाचा के घर के बिलकुल करीब था. और वहां विवेक हमलोगों से मिलने आया. बिलकुल ‘राज’ की तरह वह बाकी लोगों से ऐसे घुल मिल गया जैसे बरसों की जान पहचान हो. मुझे याद नहीं कि किसी ने विवेक को शादी में फोर्मली इनवाइट किया हो पर किसी ने जरूरत भी नहीं समझी,जैसे मान कर चल रहें हों,वह तो आएगा ही. और शादी के दिन सुबह से ही विवेक तैनात. आजकल तो स्टेज,मंडप की साज सज्जा,खाना पीना सब contract पर दे देते हैं पर उन दिनों हलवाई के सामने बैठकर खाना बनवाना,बाज़ार से राशन लाना,मंडप सजाना सब घर के लोग मिलकर ही करते थे. ऐसे में विवेक के दो अतिरिक्त उत्साही हाथ बहुत काम आ रहे थे.भैया का तो वह जैसे दाहिना हाथ ही हो गया था.


DDLJ के राज की तरह वह किसी मकसद के तहत लोगों को खुश नहीं कर रहा था. बल्कि यह उसके स्वभाव में शामिल था. फिल्म की तरह गाना बजाना तो उन दिनों नहीं होता था. पर ‘राज’ की तरह ही वह जब मौका मिलता बच्चों से घिरा रहता और जहाँ कोई मामा,चाचा,दिख जाते कहता–“बच्चों, बोलो मामा की जय’. बच्चे भी गला फाड़ कर चिल्लाते. फिर वह मामा,चाचा से कहता,”पैसे निकालिए ,ये इतनी जयजयकार कर रहें हैं.” वे लोग भी हंसते-हंसते सौ पचास रुपये पकडा देते और वह मुझे थमा देता,’जमा करो,सब मिलकर चाट खाने जायेंगे या सबके लिए चॉकलेट लाया जाएगा.”


अमरीश पुरी की तर्ज़ पर  कई बड़े-बूढे उसे यूँ काम करता देख, ऐनक उठा,सीधे ही पूछ लेते.”तुम किसके बेटे हो?”और वह मुझे इंगित कर कहता,”मैं इनका छोटा भाई हूँ”..क्या परिचय देता कि मैं लड़की की चाची की बहन के देवर का बेटा हूँ.


शादी के दूसरे दिन, सुबह जब दूल्हा शेव कर तैयार होने लगा तो विवेक पहुँच  गया,”अरे आप दूल्हा हैं,खुद शेव करेंगे?..लाइए मैं शेव कर देता हूँ.” और शेव करने के बाद बोला,”अब नेग निकालिए” लड़के ने भी मुस्कुराते हुए कुछ नोट पकडा दिए जो मेरे पास जमा हो गए. इस बार आइसक्रीम खाने के लिए.


मेरे चाचा दिखने में तो अमरीश पुरी की तरह रौबदार नहीं थे पर उनके बच्चों के साथ साथ हमलोग भी उनसे बहुत डरते थे. उस पर से जब बाराती छत पर पंगत में खाना खाने बैठे तो विवेक ने उनकी चप्पलें छुपा दीं. जब चप्पलें ढूंढी जाने लगी तो चाचा की क्रोधाग्नि में भस्म होने का हम सबको पूरा अंदेशा था. हमने विवेक को आगे कर दिया, “तुम्हारा आइडिया था,तुम भुगतो” और वह चाचा से बहस करता रहा,’इनलोगों ने जनवासे में हमें कितना परेशान किया है…समोसे गरम नहीं हैं…थम्स-अप ठंढा नहीं है.,…आइसक्रीम पिघली हुई है…इन्हें भी थोड़ा परेशान होने दीजिये ”  पूरी शादी में पहली बार चाचा के चेहरे पर मुस्कान दिखी और उन्होंने विवेक को मनाया,चप्पलें वापस करने को.


विदा होते समय रूबी जोर-जोर से रो रही थी. भाई शायद पूरे साल बहन से झगड़ता हो,पर विदाई के समय बहन को रोते देख उसका दिल दो टूक हो जाता है, भैया ने विवेक को बोला,’तुम कार में साथ में बैठ जाओ,रास्ते में जरा उसे हंसाते हुए जाना.” 
विवेक बोला..’अरे मेरे कपड़े नहीं हैं,कोई तैयारी नहीं है,ऐसे कैसे चला जाऊं?”
भैया ने बोला,’कोई बात नहीं,मैं कल लेता आऊंगा’ 
और विवेक दुल्हन के साथ दूसरे शहर चला गया,जहाँ पहुँचने में कम से कम ८ घंटे लगते थे.

फिर बरसों बाद विवेक से मिलना हुआ. मेरे मन में उसकी वही शरारती छवि विद्यमान थी.पर १२वीं में पढने वाला वह लड़का, अब धीर गंभीर बैंक ऑफिसर बन चुका था,शादी भी हो गयी थी. बड़े अदब से मिला…मैंने पति से परिचय करवाया.”ये विवेक है”(पर दूसरी पंक्ति कि ‘जिसकी विवेक से कभी मुलाक़ात नहीं हुई’ कहते कहते रुक गयी.) 


अच्छा है कि ‘राज’ एक फिल्म किरदार है और हमारी यादों में अपने उसी रूप में जिंदा है वरना सोलह साल बाद उसके हाथ में भी  ‘माऊथ ऑर्गन’की जगह एक लैपटॉप होता और चेहरे पर सदाबहार खिली मुस्कान की जगह होता चिंताओं का रेखाजाल.
"दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे', फिल्म, DDLJ में प्रकाशित किया गया | 28 टिप्पणियाँ

सुबह की सैर के बहाने

कुछ दिनों पहले प्रवीण पाण्डेय जी ने और अजित गुप्ता जी ने अपने प्रातः भ्रमण पर एक पोस्ट लिखी थी…इसके काफी पहले से ही मैं भी मय-तस्वीरों के एक पोस्ट लिखनेवाली थी….पर बस, टलता ही रहा..कुछ महीनो से पता नहीं कैसी व्यस्तता चल रही है कि अब इसका जिक्र भी फ़िज़ूल लग रहा है…


जब-जब थोड़ा समय निकाल कर ऑनलाइन आई…ब्लॉग-जगत में चल रही किसी ना किसी डिस्कशन  में उलझ गयी…दिमाग का दही बन गया है..:(


अब शायद ये पोस्ट लिखते वक्त जरा मूड फ्रेश हो जाए…आशा है आपका भी. {लेखन से नहीं तो तस्वीरों से ही सही :)}

शायद बचपन में ही हॉस्टल में रहने के कारण सुबह उठने में कभी आलस्य महसूस नहीं हुआ…बच्चों के स्कूल की खातिर तो खैर सारी महिलाओं को सुबह की नींद को तिलांजलि  देनी ही पड़ती है. तो सुबह बच्चों को स्कूल बस में बिठाकर मेरा प्रातः-भ्रमण शुरू हुआ. मेरे घर के आस-पास के दो पार्क में जाने में तो पांच मिनट भी नहीं लगते…दो और पार्क भी पास ही हैं..वहाँ जाने में दस मिनट लगते हैं…उनमे से तीन पार्क में सुमधुर संगीत भी बजता रहता है…लता-रफ़ी-किशोर के के पुराने नगमे . बस सुबह की शुरुआत हो तो ऐसी.:) 


फिर भी मैं इन पार्क में नहीं जाती. जाने की शुरुआत तो की पर जॉगिंग ट्रैक पर वो गोल-गोल चक्कर लगाते बोर हो जाया  करती थी. कभी समय देखती कभी राउंड गिनती…आगे चलने वालों को पीछे छोड़ देने की चाह में चाल तेज करने में मजा भी आता…कई सारी सहेलियाँ भी मिल जातीं…फिर भी एकरसता कायम रहती .

और मिलते-जुलते खयालात वाले लोग आपस में मिल ही जाया करते हैं. राजी भी बच्चों को छोड़ने बस स्टॉप पर आती..उसे भी मॉर्निंग वाक का शौक….पर पार्क में जाना गवारा नहीं. उसने कॉलोनी के अंदर से पेडों से घिरा एक ख़ूबसूरत सा रास्ता चुन रखा था…लम्बा-घुमावदार-ऊँचा-नीचा रास्ता जिसपर चल कर जाने और आने में कुल एक घंटे लगते…और मैं उसके साथ हो ली. अच्छी कंपनी-ख़ूबसूरत रास्ता-सुबह का समय..परफेक्ट कॉम्बिनेशन. कहीं अमलतास के फूलों की चादर बिछी होती तो कहीं हरसिंगार के फूलों की. चिड़ियों की चहचहाट  के साथ, कोयल की कूक भी खूब सुनायी देती है. {दूसरे पक्षियों की आवाज़ मैं पहचानती ही नही :)}

इन रास्तों पर कई लोग मिलते हैं. उनमे एक हैं मेजर अंकल ( राजी कई बार पूछ चुकी है…अब तक मेजर अंकल का जिक्र तुम्हारी पोस्ट में नहीं आया? ) लम्बे-छरहरे तेज चाल से चलते हुए अंकल से कोई पहचान नहीं है..पर वे हमें वाक करते देख बड़े खुश होते हैं…दूर से ही हाथ फैला कर कहते हैं. ” My  daughters  ” और राजी कहती है..अगर फॉरेन कंट्रीज में होते तो अंकल जरूर हमें गले से लगा लेते. उनकी आवाज़ से ही इतना स्नेह छलक रहा होता है.  पर हमारे यहाँ तो अजनबियों को देख कर मुस्कुराते भी नहीं. मॉर्निंग वाक पर कुछ चेहरे हम वर्षों से देख रहे हैं.पर एक-दूसरे को देख कर भी अनदेखा कर देते हैं. ऐसे में विदेशों की ये प्रथा अच्छी लगती है. जहाँ अजनबियों की तरफ भी एक मुस्कान उछालने  से कोई परहेज नहीं की जाती.

एक बार कुछ दिनों तक अंकल को नहीं देखने पर हमने पूछ लिया..’ अंकल वेयर हैव उ बीन ?’   और उन्होंने कहा,  “डोंट कॉल मी अंकल…कॉल  मी पप्पा ” . शायद उनकी बेटी भी हमारी उम्र की ही होगी. अगर हमें फोन पर बात करते  देख लिया तो जोर की डांट भी लगा देते हैं…और हमने भी अगर उन्हें सामने से आते देख लिया तो जल्दी से फोन नीचे कर देते हैं… बारिश के दिनों में छतरी लाना भूल गए तब भी डांट पड़ती  हैं….अगर कभी थक कर हम  चाल धीमी कर देते हैं…तो उत्साह बढ़ाती उनकी आवाज़ जरूर आती है  ” walk  fast… walk   fast  ” 


कुछ लोगो का एक ग्रुप है जिसे उन्होंने खुद ही नाम दे रखा है..”गोविंदा ग्रुप” वे लोग एक दूसरे को देखकर नमस्ते या हलो नहीं बोलते….एक ख़ास अंदाज़ में ‘गोss विंदा’ कहते हैं. रास्ते में एकाध झोपडी भी है..उसके बाहर छोटे-छोटे बच्चे , इस ग्रुप को देखते  ही जोर से ‘गोssविंदा’ कहकर चिल्लाते हैं ये लोग भी उसी सुर में जबाब देते हैं…इतने उम्रदराज़ लोगो का ये बचपना देखना,अच्छा लगता है. 

महिलाएँ नियमित कम ही हैं..कुछ दिनों के लिए आती हैं..फिर ब्रेक ले लेती हैं. हमारी भी कई सहेलियों ने हमारे साथ वाक शुरू किया…पर कुछ दिनों  से ज्यादा  नियमित नहीं हो सकीं. पर एक Miss Sad  face  भी हमारी तरह ही रेगुलर है. पता नहीं क्यूँ हमेशा उसके चेहरे पर हमेशा एक मायूसी…एक वीतराग सा भाव रहता है. किसी ने कहा है, ” if u  see someone  without a smile , give him one  of yours ”  पर हमने कितनी कोशिश की पर वो सीधा सामने देखती हुई चली जाती है. हमारी स्माइल लेती ही नहीं. .:(

लिखते वक्त एक कुछ साल पहले की घटना याद आ रही है…जब हमने कुछ शैतानी भी की थी. कुछ दिनों से हम गौर कर रहे थे …एक पेड़ के नीचे एक कार खड़ी होती है…शीशे चढ़े होते हैं. हम समझ गए उसके यूँ खड़े होने का मकसद. और जान-बूझकर उस कार के आस-पास जोर जोर से बातें करते हुए चक्कर लगाते रहते. कुछ ही दिनों में वो कार नया ठिकाना ढूँढने को निकल पड़ी. 

पिछले एक दो साल से सुबह चेन खींचने की घटनाएं भी आम हो गयी हैं. …अब पुलिस गश्त लगाती रहती है. एक बार मोटरसाइकल पर एक पुलिसमैन को अपनी तरफ घूरते हुए पाया..और मन खीझ गया…मुंबई में तो आम लोग भी नहीं घूरते और ये पुलिसवाला…बेहद गुस्सा आया. पर आगे देखा वो एक महिला को रोक कर समझा रहा था..”चेन या मंगलसूत्र पहन कर ना आया करें” तब समझ में आया…वो देख रहा था…मैने भी पहनी है या नहीं…हाल में ही एक पुलिसमैन, मोटी चेन पहने एक पुरुष को समझाते हुए कह रहा था,…”काय करता तुमीस….अमाला प्रोब्लेम  होतो”.

सैर से लौटते समय अक्सर  ही सब्जियां खरीद लाते हैं हम और हर बार मेरी जुबान से निकल ही जाता है..”ओह! रिटायर लोगो की तरह…रोज़ सब्जियां खरीद कर ले जाती हूँ” मुंबई में पली-बढ़ी राजी को ये बात समझ नहीं आती….और वो समझाने पर भी नहीं समझ  पाती…”हमारे यहाँ यूँ, सुबह-सुबह औरतें सब्जी खरीद कर नहीं लातीं” 

जब हम, पसीने से लथ-पथ.. चिपके बाल.. थका चेहरा लिए बिल्डिंग  के अंदर आते हैं…तो कितनी ही सजी संवरी , सुन्दर कपड़ों में बिलकुल फ्रेश दिखती  महिलाएँ ऑफिस के लिए निकल रही होती हैं. हम उन्हें देख कर मायूस हो जाते हैं…पर वे शायद हमें देख उदास हो जाती होंगी..क़ि “क्या लग्ज़री है…हम तो मॉर्निंग वाक पर जाने की सोच भी नहीं  सकते” 
वही है..कुछ खोया  कुछ पाया…

कौन चित्रकार है…ये कौन चित्रकार 

ये टहनियों से पैकेट की तरह लटकते चित्र , उलटे टंगे  चमगादड़ों के हैं.

विटामिन डी देने आ गया सूरज 

हम तो चले स्कूल 

मराठी पढ़ाने वाले हमारे कॉलोनी के काका..जिनपर एक पोस्ट लिखनी कब से ड्यू है.
पेवमेंट पर बिकती वसई से आई ताज़ी सब्जियां 

प्रातः भ्रमण, मेजर अंकल, हॉस्टल में प्रकाशित किया गया | 64 टिप्पणियाँ