परकटे नन्हे परिंदे

रचना जी ने अपनी पोस्ट में ‘बाल मजदूरी’ के मुद्दे पर चर्चा की है…पहले भी मैने इस विषय पर लिखा है…और आज भी  मन में कुछ सवाल सर उठा रहे हैं…आखिर, बच्चे अपने खेलने-कूदने ..पढ़ने-लिखने के दिनों में ये सोलह घंटे का श्रम और अमानवीय स्थिति में जिंदगी गुजारने को क्यूँ मजबूर हो जाते हैं?


उन्हें काम पर रखने वाले दोषी हैं…तो क्या उनके माता-पिता का कोई दोष नहीं जो उन्हें इस कच्ची सी उम्र में काम के बोझ तले दब जाने को मजबूर कर देते हैं?? गरीबी एक बहुत बड़ा कारण तो है ही…पर उस से भी ज्यादा मुझे लगता है…उनके बीच जागरूकता की कमी…और पढ़ने-लिखने की सुविधा का अभाव भी एक वजह  है.

कई बार गाँव के गरीब लोग अपने बच्चों को नौकर के रूप में इसलिए रखवाते  हैं कि वो एक अच्छे परिवार के संसर्ग में रहेगा. मैने खुद देखा है…कितनी ही बार लोग खुद अपने बच्चे को लेकर आते थे और कहते थे..’सारा दिन सडकों पर  बाग़-बगीचों में घूमता रहता है…आपलोगों के साथ रहकर कुछ सीख जाएगा” खैर, मैं ये नहीं कहती कि इसके पीछे पैसों का लालच नहीं होगा…लेकिन माता-पिता की ये चिंता भी रहती है कि…ये गाँव में खाली बैठा अपना समय बर्बाद कर रहा है. अगर गाँवों में बच्चों के स्कूल जाने की व्यवस्था हो….स्कूल में शिक्षक हों..और वहाँ सचमुच पढ़ाई होती हो. बच्चों के माता-पिता को ये विश्वास दिलाया जाए कि बच्चा-पढ़ लिख कर आपसे बेहतर जिंदगी जी सकेगा..उनके सामने ऐसा कोई उदाहरण भी हो ..जहाँ उनके बीच का कोई बच्चा पढ़-लिख कर अच्छी जिंदगी बसर कर रहा हो  तो ये तस्वीर बदल सकती है. और अगर सरकार की mid day meal की व्यवस्था सुचारू रूप से कार्यान्वित की जाए तो इस समस्या का शत प्रतिशत हल निकल सकता  है.

गरीब लोग सिर्फ गाँव में ही नहीं..शहर में भी हैं. मुंबई की झुग्गी झोपड़ियों में गाँव से आकर ही बसे हुए हैं . मानव-स्वभाव की तरह लालच इनमे भी होगा…ये भी अपने बच्चे को काम पर लगा पैसे पाने की सोचते होंगे. पर इनकी सोच में बदलाव आ चुका है. यहाँ, ज्यादातर सब अपने बच्चों को स्कूल में पढ़ाने की कोशिश करते हैं. बच्चों के लिए ट्यूशन रखते हैं…अगर उनकी पढ़ने में रूचि रही और उन्होंने अच्छा रिजल्ट लाया तो उन्हें कॉलेज में भी पढ़ाते हैं. क्यूंकि उनमे ये जागरूकता आ चुकी है कि बच्चे अगर पढ़-लिख गए तो उनकी जिंदगी संवर जायेगी . यहाँ ,बच्चों को स्कूल की सुविधा है….जहाँ पढ़ाई भी होती है.

मनुष्य गरीब हो या अमीर..हमेशा अपनी संतान के लिए एक अच्छी जिंदगी का सपना देखता है..अपवाद हो सकते हैं..पर हर गरीब अपने बच्चों को सिर्फ धनोपार्जन का एक जरिया नहीं समझता. अगर उनके सामने बेहतर विकल्प रखे जाएँ तो वे कभी अपने बच्चों से किसी भी किस्म  की मजदूरी करवाने को तैयार नहीं होंगे.

लेकिन सारी सरकारी योजनायें कागजों पर ही रह जाती हैं या फिर सिर्फ नाम के लिए इनका कार्यान्वयन होता है. कितने ही स्कूल कागज़ पर ही हैं…उस स्कूल में बच्चों का भी जिक्र रहता है और शिक्षक हर महीने तनख्वाह भी ले जाते हैं. ‘मिड डे मील’ की व्यवस्था है..पर बच्चों को खाने में कंकड़-पत्थर..कीड़ों से भरे चावल दिए जाते हैं.छात्रवृत्ति की भी योजना है पर पता नहीं सही पात्रों को वो मिलती भी है या समर्थ लोग तिकड़म लगा..वो भी हड़प कर जाते हैं. 

आंकड़े बताते हैं…हमारे देश में,  एक करोड़ से भी ज्यादा बाल श्रमिक हैं. करीब पच्चीस साल पहले ही ‘बाल श्रम ‘के विरुद्ध कानून बन चुका है…पर उस समय से बाल श्रमिकों की संख्या में  १५% की वृद्धि ही हुई है. बाल श्रम के विरुद्ध कानून बना कर कुछ नहीं किया जा सकता…जब तक गाँवों को विकसित नहीं किया जाएगा…वहाँ भरण-पोषण और पढ़ने -लिखने की सुविधा नहीं मुहैया करवाई जायेगी…ये बाल मजदूरी का कलंक हमारे समाज के माथे पर विद्यमान रहेगा.
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About rashmiravija

मुझे लिखना पसंद है..कहानियाँ..कविताएँ..समसामयिक विषयों पर आलेख लिखती हूँ...अखबारों ..पत्रिकाओं में रचनाएं,प्रकाशित भी होती है. मुंबई आकाशवाणी से निय्तामित रूप से कहानियाँ और वार्ताएं प्रसारित होते हैं.
यह प्रविष्टि 'बाल मजदूरी', 'मिड डे मील' में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

28 Responses to परकटे नन्हे परिंदे

  1. shilpa mehta कहते हैं:

    :(when will we change ourselves?no point in criticising the poor parents who are hand to mouth. we need to question ourselves – do we employ kids because we want to get help cheaply? may be 200 rs a month less ?

  2. मनोज कुमार कहते हैं:

    आपसे बिल्कुल सहमत कि –जब तक गाँवों को विकसित नहीं किया जाएगा…वहाँ भरण-पोषण और पढ़ने -लिखने की सुविधा नहीं मुहैया करवाई जायेगी…ये बाल मजदूरी का कलंक हमारे समाज के माथे पर विद्यमान रहेगा.अब देखिए ना …एक ग्रामीण परिवार का औसत मासिक खर्च 2770 रू0 खेती सहित सभी स्त्रो तों से मासिक आय 2115 रू0 इसमें मजदूरी भी शामिल है । अब बताइए यह घाटा कौन पूरा करेगा?(ज़ारी है …)

  3. मनोज कुमार कहते हैं:

    बेचारे ग्रामीण लोगों के सिर पर क़र्ज़ का बोझ भी कम नहीं होता। और इसकी पीड़ा इस हद तक हो जाती है कि लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं।एक आंकड़े के मुताबिक १९९७-२००१ के बीच ८० हज़ार से ज़्यादा किसानों ने अत्महत्या कर ली थी

  4. मनोज कुमार कहते हैं:

    पेट भर दाना इन्हें नहीं मिलता, तो इनके बच्चे कुपोषित हो जाते हैं। दुनिया में 14.6 करोड़ कुपोषित बच्चे हैं। अकेले भारत में 5.7 करोड़ बच्चे कुपोषित हैं। अब पेट पालने के लिए यदि बाल श्रम करना पड़ता है।

  5. मनोज कुमार कहते हैं:

    सरकारी आंकड़ो पर यदि गौर करे तो बाल श्रमिको की संख्या लगभग 2 करोड़ हैं परन्तु निजी स्रोतों पर गौर करे तो यह लगभग 11 करोड़ से अधिक हैं

  6. रचना दीक्षित कहते हैं:

    बाल मजदूरी और अशिक्षा का मुख्य कारण तो गरीबी ही है यद्यपि अन्य कारणों को भी नकारा नहीं जा सकता. इस विचारोत्तेजक आलेख के लिये शुभकामनाएँ.

  7. रश्मि, तुमने लिखा है ".उनके बीच जागरूकता की कमी…और पढ़ने-लिखने की सुविधा का अभाव भी एक वजह है."लेकिन मुझे ऐसा पूरी तरह ठीक नहीं लगता. इन परिवारों में अधिसंख्य परिवार ऐसे हैं, जो जागरूक होना ही नहीं चाहते. बच्चों को पढाने की बात पर उनका सीधा सा जवाब होता है कि "हमें कौन कलक्टरी करानी है इनसे…" ये मैंने खुद भोगा है इसलिये बता रही हूं. मेरे स्कूल से थोड़ी दूर ही एक स्लम एरिया है, जहां जाकर मैने खुद बच्चों को स्कूल भेजने और नि:शुल्क पढाने का आग्रह किया, लेकिन उनका जवाब यही था 😦 नर्सरी क्लास से उठती आवाज़ों का अनुसरण कर, दो गरीब बच्चे रोज़ मुझे स्कूल गेट पर पूरी ए बी सी डी बोलते मिलते थे, इसी बिना पर मैं उनकी बस्ती में गयी थी 😦 इन्हीं बच्चों से जब मैने कहा कि वे मेरे पास पढने आ जाया करें, तो उनका जवाब था कि मम्मी गुस्सा होगी :(इन सारे बच्चों के नाम सरकारी स्कूलों में लिखे हैं, जहां से इन्हें यूनिफ़ॉर्म, किताबें सब मिलता है, लेकिन ये केवल मध्यान्ह भोजन के समय वहां जाते हैं :(फिर भी हमें कोशिशें तो जारी रखनी ही चाहिये. कम से कम ये बच्चे मजदूरी तो न ही करें.

  8. रचना कहते हैं:

    रश्मि जी मैने पोस्ट में दो मुद्दे उठाये हैंपहला की नाबालिग से काम लेना कानूनन अपराध हैं औरदूसरा नाबालिग को अगर तनखा बालिग के हिसाब से डी जाती हैं तो क्या ये संभव हैं की उसको बच्चा समझा जायेगा .कानून के हिसाब से अगर हम सब केवल और केवल बालिग़ को ही नौकरी देगे तभी इस में बदलाव संभव हैंये किसी भी के लिये संभव ही नहीं हैं की वो जिस बच्चे को नौकरी पर रखता हैं उसको अपने बच्चे के समान माने . जब क़ोई भी पैसा देता हैं तो काम लेगा ही .सरकार का कोई भी प्रयास कुछ नहीं कर सकता क्युकी जो लोग "गरीब " हैं वो अपने बच्चो को पैसा कमाने की मशीन मानते हैं और खुद कहते हैं की बच्चे ज्यादा होने से कोई नुक्सान नहीं होता . उनके हिसाब से बच्चो पर कोई खर्चा ही नहीं होता हैं . उनका तो एक ५ साल का बच्चा भी रद्दी जमा करके दिन में ३० रूपए कमा लेता हैंसोच कर देखियेशोषण अब किस का हो रहा हैं ??उनका जिनके यहाँ कम बच्चे हैं और स्तर गरीबी की रेखा से ऊपर हैं या उनका जिनके यहाँ ज्यादा बच्चे हैं , स्तर गरीबी रेखा से नीचे हैं . जिनको फ्री शिक्षा हैं इत्यादिआज कल एक आम बच्चे को पढ़ने में महीने में करीब ८०००० रुपया तो लग ही जाता हैं . इस प्रकार से एक माध्यम वर्ग का बच्चा १२ तक१००००० रुपया खर्च करता हैं और अगर ट्यूशन इत्यादि हो तो इसका क़ोई हिसाब ही नहीं हैंउसके बाद कॉलेज और फिर नौकरी यानी उनकी बात जो साधरण हैं आम हैं पढाई में . नौकरी में वो कॉलेज के बाद शायाद ६००० पाने लगे . वही एक १४ साल की बच्ची ४००० कमा कर दे रही हैं , क्या आप को अज्ञान लगता हैं ?? नहीं उनको समझ आगयी हैं की ज्यादा से ज्यादा कैसे लेना हैं और इस लियेबच्चो को नौकरी पर रखना तुरंत बंद होना चाहिये .

  9. ajit gupta कहते हैं:

    रश्मि जी मैने लम्‍बे समय तक गाँवों में कार्य किया है और आज भी ग्रामीणजनों से सम्‍पर्क है। मेवाड़ क्षेत्र जनजातीय क्षेत्र है, इसी क्षेत्र के सर्वाधिक बच्‍चे बाल मजदूरी कर रहे हैं। आज के 15 वर्ष पूर्व तक गाँवों में पर्याप्‍त स्‍कूल नहीं थे लेकिन इसके बाद इस क्षेत्र में( मै सम्‍पूर्ण देश के बारे में नहीं कह रही हूँ) शिक्षा के लिए बहुत कार्य हुआ। शिक्षाकर्मी योजना, लोकजुम्बिश योजना आदि आयी और शिक्षा जगत में क्रान्ति सी हुई। लेकिन इसक‍े उपरान्‍त भी बाल मजदूरी नहीं थमी। माता-पिता को लगता है कि आठवी पास कराकर या पांचवी पास कराकर क्‍या होगा, इससे अच्‍छा है कि अभी से कोई कार्य करने लगे। जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा के प्रति रूचि बहुत ही कम है। वे प्रकृति के साथ ही रहना चाहते हैं। इसलिए सुविधा देने के बाद भी वे पढ़ते नहीं हैं। आज भी इन क्षेत्रों में उच्‍च शिक्षा का प्रतिशत बहुत ही कम है।

  10. rashmi ravija कहते हैं:

    .@वंदना ,ये पंक्तियाँ खासकर मैने इसीलिए लिखी हैं…" बच्चों के माता-पिता को ये विश्वास दिलाया जाए कि बच्चा-पढ़ लिख कर आपसे बेहतर जिंदगी जी सकेगा..उनके सामने ऐसा कोई उदाहरण भी हो ..जहाँ उनके बीच का कोई बच्चा पढ़-लिख कर अच्छी जिंदगी बसर कर रहा हो तो ये तस्वीर बदल सकती है."जबतक माता-पिता को ये विश्वास नहीं होगा कि अच्छी शिक्षा से बच्चों के जीवन में परिवर्तन आ सकता है….वे शिक्षा के महत्त्व को नहीं समझेंगे…हाँ,यह बात उन्हें कैसे समझाई जाए…उनमे यह जागरूकता कैसे लाई जाए, यह सोचने का विषय है.मैने मुंबई का उदाहरण इसीलिए दिया है…गाँव से ही आए उनके ही भाई-बन्धु..कैसे इस बात को समझ जाते हैं?…मेरी बिल्डिंग ..आस-पास की बिल्डिंग में काम करने वाली करीब करीब सभी बाइयों के बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं. मेरी बाई का बेटा फेल हो गया..उसका पढ़ने में मन नहीं लगता पर वो कटिबद्ध है कि अपने बेटे को दसवीं पास करवा के रहेगी…वो कहती है,"अगर नहीं पढ़ेगा तो कहीं कोई गलत रास्ता ना चुन ले…पढ़-लिख कर नौकरी कर सकेगा."मेरी उलझन है कि यही बात ग्रामीण इलाकों के लोग क्यूँ नहीं समझ पाते…उन्हें इस बात का विश्वास दिलाना ही पहला कर्तव्य होना चाहिए.

  11. rashmi ravija कहते हैं:

    @मनोज जी,गरीबी तो एक सबसे बड़ा कारण है ही.लेकिन कुछ गाँवों में जहाँ भुखमरी की नौबत नहीं है…दो वक़्त का खाना मिल जाता है…वहाँ भी लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते…किसी के घर नौकर बना कर भेज देते हैं ( ये मेरी आँखों देखी बात है..मेरे अपने गाँव की) क्यूंकि शिक्षा के फायदे से वे अनजान हैं.

  12. rashmi ravija कहते हैं:

    @अजित जी,सचमुच यह चिंता का विषय है…कि इतनी सुविधाएं देने के बाद भी वे लोग पढना नहीं चाहते.उच्च शिक्षा लें, यह कोई जरूरी नहीं…पर प्रारंभिक शिक्षा तो अनिवार्य होनी चाहिए.

  13. ali कहते हैं:

    मुझे लगता है कि ऐसे पालक शायद ही मिलें जोकि अपने बच्चों को पढ़ाना ना चाहें बशर्ते उनकी आर्थिक स्थिति ठीक हो !मिड डे मील निसंदेह एक अच्छी योजना है पर यह परिजनों का आर्थिक संबल बनने की पर्याय नहीं है सच कहूं तो योजनाएं भी बुरी हुआ करती हैं कभी :)गरीबों के लिए पढाई का जो विकल्प और तंत्र हमने विकसित किया है उसकी दम पे कितने गुदड़ी के लाल पैदा किये जा सकते हैं और इस सिस्टम में पढकर निकले हुओं का भविष्य क्या है ?बाल श्रम में १५% का इजाफा श्रम मंत्रालय और अधीनस्थ विभागों की कार्यप्रणाली का बेहतरीन उदाहरण है !बहरहाल आपने एक सार्थक मुद्दा उठाया है पिछले बरस भी सिवकासी के बहाने आपने इस मुद्दे पर कलम चलाई थी ! आपकी चिंताएं तारीफ के काबिल हैं ! आपका बहुत बहुत आभार ! हमारी हाज़िरी दर्ज कर लीजियेगा !

  14. रवि धवन कहते हैं:

    और इसकी परिणति ये भी होती है कई बार…जिसे मैंने या शायद कितनों ने ही देखा होगा। कभी-कभी तो कच्ची उम्र में मिलने वाले कड़वे घूंट से जिंदगी इन्हें इतना कठोर बना देती है कि ये बड़े होकर गलत रास्ते को ही चुन लेते हैं। ये बिल्कुल सही है कि सुधार के लिए जागरूकता ही अहम कड़ी हो सकती है। निश्चित तौर पर कुंभकर्णी सरकार को भी जगाना होगा।

  15. डॉ टी एस दराल कहते हैं:

    बाल श्रम कुछ की मजबूरी हो सकती है । लेकिन यह भी सच लगता है कि जब एक घर में ६ बच्चे होंगे तो संसाधनों की कमी की वज़ह से सब को भर पेट खाना मुहैया नहीं कराया जा सकता । ऐसे में मां बाप उन्हें सौंप देते हैं शहरी बाबुओं को । आखिर पैसा आता हुआ किसे बुरा लगता है । विशेषकर इन लोगों में संवेदनाओं की कमी सी लगती है ।सही कहा , इसे रोकने के लिए गाँव का विकास ज़रूरी है ।

  16. आधार जब तक अस्थायी रहेगा, अस्थिरता बनी रहेगी।

  17. सतीश सक्सेना कहते हैं:

    अधिकतर घरों में किसी न किसी रूप में बच्चों से काम करवाया जाता है और उस पर तुर्रा यही है कि हमने तरस खा कर नौकरी दी है !पैसे बचाने के लिए सब जायज माना जाता है….बीमार होते ही निकाल बाहर किया जाता है कि जब ठीक हो जाओ तब काम पर आ जाना !दूसरे पक्ष की गरीबी जो न कराये व कम है !

  18. राज्य सरकार ने प्रखंड स्तर पर श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी नियुक्त किये हैं जिनका मुख्य कार्य है बाल श्रमिकों को बचाना और बंधुआ मजदूरों के हितों की रक्षा करना. साथ ही न्यूनतम मजदूरी लागू करना.. और मैंने बहुत करीब से इन तीनों कार्य क्षेत्रों की धज्जियां उड़ाते देखी हैं!!हमारे यहाँ क़ानून की कमी नहीं हैं, बड़े सख्त कानून हैं.. लेकिन प्रवर्तन यानी एनफोर्समेंट ही पंगु है तो हम सिर्फ अफ़सोस ही करते रहेंगे!!बहुत ही अच्छा कवरेज दिया है आपने!!

  19. सबसे ज्यादा अफ़सोस इस बात है की योजनायें बरसों से बन रही हैं पर हालात जस के तस हैं ….. बचपन के ये हाल हमारे विकास के सारे दावों की पोल खोलता है ….. जो बहुत दुखद भी है …..

  20. वाणी गीत कहते हैं:

    इन बच्चों को शिक्षा के लिए प्रेरित करना बहुत मुश्किल है …घर के काम में सहायता करने वाले बच्चों को पढ़ाने की बहुत कोशिश की , मगर उसे पढने से ज्यादा खाना बनाना अच्छा लगता था, इतनी भुखमरी , तंगी और दबाव में रह चुके इन बच्चों को मोटिवेट करना बहुत मुश्किल कार्य है .. खाना मांगने आने वाले बच्चों के साथ बहुत माथापच्ची करती हूँ, मगर वे सुनने को तैयार नहीं …छोटे- छोटे बच्चे जिस सुर में भीख मांगते हैं और उसकी ट्रेनिंग माता पिता द्वारा दी जाती है , देख कर कितना खून जला चुकी अपना!!इनको श्रम से दूर कर हम कही भीख मांगने के लिए तो विवश नहीं कर रहे , यह भी सोचना होगा !

  21. Arvind Mishra कहते हैं:

    जिस देश में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है वहां बच्चों को बचपन से स्वावलंबी बनने के विकल्प को धता बता कर लम्बी चौड़ी बातें कर उन्हें फिर एक अन्धकारमय भविष्य की और ढकेल देना बहुत एक बड़ी गलती है -हमने अनेक बाल पुनर्वास योजनाओं की लफ्फाजी और सच देखा है …और मनुष्य के बच्चे एक उम्र के बाद शरीर से भले अविकसित से हों दिमाग उनका तेज हो जाता है -तो उन्हें कड़े शारीरिक श्रम के बजाय हलके श्रम और दिमागी प्रमुखता लिए कामों में लगाने में मुझे तो कोई बुराई नहीं लगती …..

  22. Ghanshyam Maurya कहते हैं:

    Whether it is in villages or cities, people who produce the output don't get their due. Its only middlemen and capitalists who take lion's share. Government's agri-loan policy is also has adverse cascading effects on the financial condition of Indian farmers, whereas in cities, labourers are being exploited at the hands of factory/establishment owners. As far as schooling system is concerned, you can find signboards of Municipal schools hanging in some dilapidated building with no school existing there at all.

  23. GGShaikh कहते हैं:

    पच्चीस साल पहले बने 'बालश्रम' विरुद्ध कानून का आज यह हश्र है तो 'अन्ना जी आपके 'जनलोकपाल' बिल का क्या होगा जनाबे आली …!!!{:=/

  24. दिगम्बर नासवा कहते हैं:

    शिक्षा ही इस समस्या के मूल में है और ये मूलभूत अधिकार देश में हर स्तर तक जा कर करना होगा … क़ानून बना देने से कुछ नहीं होने वाला … सरकार की सोच इस दिशा में कुछ कर सकती है …

  25. पर उस समय से बाल श्रमिकों की संख्या में १५% की वृद्धि ही हुई है. बाल श्रम के विरुद्ध कानून बना कर कुछ नहीं किया जा सकता…जब तक गाँवों को विकसित नहीं किया जाएगा…वहाँ भरण-पोषण और पढ़ने -लिखने की सुविधा नहीं मुहैया करवाई जायेगी…ये बाल मजदूरी का कलंक हमारे समाज के माथे पर विद्यमान रहेगा.पूरी तरह सहमत…और ये स्थिति हर तरफ़ देखने को मिलती है रश्मि जी…सबसे ज़रूरी सामाजिक चेतना है.

  26. Atul Shrivastava कहते हैं:

    गंभीर चिंतन प्रस्‍तुत करता पोस्‍ट।

  27. वन्दना कहते हैं:

    विचारणीय आलेख सोचने को मजबूर करता है।

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