सुबह से ही आँखों में नमी सी है….

अनूप जलोटा के जन्मदिन पर उनके पारिवारिक समारोह में बर्थडे बॉय की फरमाईश पूरी करते हुए

काश..काश…ऐसी पोस्ट लिखने का मौका कभी नहीं आता…कोई चमत्कार हो ही जाता और जगजीत सिंह जी सकुशल अस्पताल से वापस अपनी उन्ही ग़ज़ल की दुनिया में लौट आते…पर ऐसा हो ना सका.


रोज़ अखबारों में उनके स्वास्थ्य के अपडेट्स ढूँढने वाली आँखें…अब उनकी अंतिम यात्रा की ख़बरें कैसे पढ़ पाएंगी, राम जाने….. दुख इतना गहरा है कि कुछ भी लिखना फ़िज़ूल लग रहा है…कहाँ इतनी काबिलियत है मेरे लेखन में कि अंदर का सारा दर्द शब्दों में उतार सके.

हमारी पीढ़ी ऐसी है कि प्रेम..रोमांस…..विछोह…दुख…दर्द… सब जगजीत सिंह की ग़ज़लों के सहारे ही महसूस किया है. फिल्म साथ-साथ..अर्थ…और उनकी ग़ज़लों के कुछ कैसेट्स सुनकर ही मन के गलियारों में एक दूसरी दुनिया का पदार्पण हुआ .

आज भी जब मैं या मेरे जाननेवाले..स्कूल-कॉलेज के दिन याद करते हैं तो जगजीत सिंह का नाम अनायास ही आ जाता है…उन दिनों उनकी गज़लों के प्रति दीवानगी की ये सीमा थी कि लगता था…उनकी गज़लें और उनकी आवाज़ में छुपा दर्द मुझसे बेहतर शायद ही कोई समझ सकता है. कितने सारे उर्दू शब्द , उनकी ग़ज़लों से ही जाना…ग़ालिब के अशआर से परिचय भी जगजीत सिंह की आवाज़ के जरिये ही हुआ.एक कजिन से शायद पिछले पंद्रह-सोलह बरस से नहीं मिली हूँ…पर आज भी जब भी बात होती है..एक बार जरूर पूछ लेता है..”अब भी वैसे ही ,जगजीत सिंह की गज़लें सुना करती हो?” उसने फेसबुक पर अकाउंट बनाया ,और फ्रेंड्स रिक्वेस्ट के साथ मैसेज में यही लिखा..”और जगजीत सिंह के क्या हाल हैं?” इतने दिनों की बिछड़ी सहेली से जब बारह बरस बाद बात हुई…तो उसने बात की शुरुआत ही इस वाक्य से की..” कुछ दिनों पहले जगजीत सिंह की बीमारी की खबर सुनी तो तुम्हे बहुत याद कर रही थी..” जगजीत सिंह के बहाने याद करने का बहाना भी गया..अब लोगो के पास से…

जिंदगी में तीन शख्सियत की ही घोर प्रशंसक रही…जगजीत सिंह..सुनील गावस्कर और जया भादुड़ी…अभी हाल में ही किसी से कहा…दो का जादू तो उतर गया…पर जगजीत सिंह के स्वर के जादू ने आज भी वैसे ही मन मोहा हुआ है…खैर जो गज़लें हमारे खजाने में शामिल हो चुकी हैं..वे तो यूँ ही महकती रहेंगी…बस अब नई ग़ज़ल शामिल नहीं हो सकेगी…इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है , ये मन.

जब आप किसी के फैन होते हैं…तो उससे सम्बंधित हर खबर…पर निगाहें होती हैं…याद है..बरसो पहले धर्मयुग में छपा उनका इंटरव्यू….जिसमे उनसे पूछा गया था..”सुना है .चित्रा सिंह से आपकी अनबन चल रही है..आपलोग तलाक लेने वाले हैं”…और जगजीत सिंह का उत्तर था..”अच्छा! हमारे बारे में भी अफवाहें उड़ने लगीं..इसका मतलब..हमलोग भी फेमस हो गए हैं”
पढ़ कर मेरी भृकुटी पर बल आ गए थे….”ये क्यूँ कहा..जगजीत सिंह ने …वे तो ऑलरेडी इतने फेमस हैं..”

इतने अपने से लगने लगे थे कि इंटरव्यू के साथ छपी तस्वीर भी पसंद नहीं आई….जिसमे चित्रा सिंह कुर्सी पर बैठी थीं..और वे पीछे खड़े थे..किशोर मन ने शिकायत की थी..”ये क्या पुराने स्टाईल में राजा-रानियों की तरह तस्वीर खिंचवाई है”

जब उन्होंने अपने बेटे को खोया था..तो उनके दर्द की सोच ही मन भीग आता था. चित्रा सिंह को संभालने के लिए जगजीत सिंह बाहरी रूप से शांत बने रहते..पर चित्रा सिंह ने एक इंटरव्यू में बताया..” वे बाहर से शांत दिखते हैं..पर आधी रात को उठ कर रियाज़ करने चले जाते हैं…और रियाज़ करते ,उनकी आँखों से झर-झर आँसू बहते रहते हैं.

इतना बड़ा दुख सहकर भी…..शो मस्ट गो ऑन की तर्ज़ पर उन्होंने शोज़ देना जारी रखा…कुल तीन बार उनकी शो में जाने का मौका मिला और हर बार जैसे गज़ले सुन कान ही नहीं…उन्हें गाते देख आँखें भी तृप्त हो जातीं . एक बार एक शो में हमलोग काफी देर से पहुंचे…और संयोग ऐसा कि ठीक जगजीत सिंह ने भी उसी समय हॉल में प्रवेश किया…मैं दरवाजे के एक किनारे खड़ी थी…और एक हाथ के फासले से हमारे आइडल गुज़र रहे थे…इतना बड़ा सुर सम्राट और सफ़ेद झक कुरते पायजामे में..इतना सिम्पल सा पर गरिमामय व्यक्तित्व …कि देखने वाला ठगा सा रह जाए. संयोग से हमारे बैठने की जगह तीसरी कतार में थी .और मैं ग़ज़ल सुनने से ज्यादा उन्हें अपलक निहार रही थी..वो बीच-बीच में अपने साजिंदों का उत्साह बढ़ाना…चुटकुले सुनाना…अपनी ही गयी ग़ज़ल की ऐसी व्याख्या करना कि हॉल ठहाकों से गूंज उठता…कुछ चुनिन्दा ग़ज़लों पर पूरा हॉल उनके साथ गाने लगता. मध्यांतर में कई लोग उनका ऑटोग्राफ लेने गए…स्टेज से ज्यादा दूरी पर मैं नहीं थी..ऑटोग्राफ लेने के लिए मुझे भी ज्यादा नहीं मशक्कत नहीं करनी पड़ती..पर पता नहीं…उस भीड़ में जाकर खड़े रहने से ज्यादा मुझे दूर से ही उनके हर क्रिया-कलाप को देखना ज्यादा अच्छा लग रहा था.

जगजीत सिंह को यूँ भी….दर्शकों के साथ interaction अच्छा लगता था. एक बार वे दिल्ली में कुछ ब्यूरोक्रेट्स की महफ़िल में ग़ज़ल पेश कर रहे थे...उन्होंने दो गज़लें सुनायी ..पर हॉल में सन्नाटा पसरा रहा...उन टाई सूट में सजे अफसरों को ताली बजाना नागवार गुजर रहा था. अब जगजीत सिंह से रहा नहीं गया.उन्होंने तीसरी ग़ज़ल शुरू करने से पहले कहा…”अगर आप लोगों को ग़ज़ल अच्छी लग रही है. तो वाह वाह तो कीजिये.यहाँ आप किसी मीटिंग में शामिल होने नहीं आए हैं.सूट पहन कर ताली बजाने में कोई बुराई नहीं है.अगर आप ताली बजाकर और वाह वाह कर मेरा और मेरे साजिंदों का उत्साह नहीं बढ़ाएंगे तो ऐसा लगेगा कि मैं खाली हॉल में रियाज़ कर रहा हूँ.”


फिर तो अपने सारे संकोच ताक पे रख कर उन अफसरानों ने खुल कर सिर्फ वाह वाह ही नहीं की और सिर्फ ताली ही नहीं बजायी.जगजीत सिंह के साथ गजलों में सुर भी मिलाये.अपनी फरमाईशें भी रखी.वंस मोर के नारे भी लगाए.(मैने बहुत पहले इस घटना से सम्बंधित एक पोस्ट भी लिखी थी )

पता नहीं..क्या क्या मिस करनेवाली हूँ…मन को समझाना मुश्किल पड़ रहा है कि उनके गाए, भजन…सबद…ग़ज़लों के अल्बम में और नए अल्बम शामिल नहीं होने वाले….अक्सर अखबार में कहीं ना कहीं उनके शो की खबर छपती थी….टी.वी. पर झलक दिख जाती थी…अब सब सूना ही रह जाएगा..

चित्रा सिंह के दुख की तो कल्पना भी मुश्किल …पहले बेटा खोया…दो साल पहले उनकी बेटी ने आत्महत्या कर ली (चित्रा सिंह और उनके पहले पति की बेटी मोनिका लाल…जो डिप्रेशन की शिकार थीं )...और अब उन्हें इन सारे संकटों में संभालने वाले हाथो का सहारा भी नहीं रहा..


ईश्वर जगजीत सिंह आत्मा को शान्ति दे…और चित्रा जी को ये अपरिमित दुख सहने का संबल प्रदान करे..


हम सब तो बस अब यही कह सकते हैं…

शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है

चित्रा सिंह, जगजीत सिंह में प्रकाशित किया गया | 33 टिप्पणियाँ

घूँघट की आड़ से….

आज आपलोगों को अपने ऊपर हंसने का जम कर मौका दे रही हूँ….अभी लिखते वक्त ही पाठकों के चेहरे नज़रों के सामने घूम रहे हैं…कि मेरी हालत पर उनकी बत्तीसी कैसे चमक रही है.:)

अब भूमिका बना दिया…मूड सेट कर दिया…तो हाल भी लिख डालूं…आपलोगों ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी…हमें भी किन हालातों से गुजरना होता है.

मेरे ससुराल में श्रावणी पूजा में पूरे खानदान के लोग इकट्ठे होते हैं. और खानादन में कोई भी नई शादी हुई हो उस दुल्हन को शादी के बाद की पहली श्रावणी पूजा में जरूर उपस्थित होना पड़ता है. मुज़फ्फरपुर(बिहार) से थोड़ी दूर पर एक गाँव है….जहाँ इनलोगों का पुश्तैनी मकान है .मकान क्या अब तो पांच आँगन का वो मकान खंडहर में तब्दील हो चुका है. पर कुल देवता अब भी वही हैं…और पूजा-घर की देख-रेख हमेशा की जाती है. उसकी मरम्मत पेंटिंग समय-समय पर होती रहती है. एक पुजारी साल भर वहाँ पूजा करते हैं. सिर्फ श्रावणी पूजा के दिन आस-पास के शहरों से सबलोग वहाँ इकट्ठे होते हैं.

तो मुझे भी शादी के बाद जाना था . अब नई शादी और गाँव में जाना था सो पूरी प्रदर्शनी. सबसे भारी बनारसी साड़ी…सर से पाँव तक जेवर ..मतलब सर के ऊपर मांग टीका से लेकर पैर की उँगलियों के बिछुए तक.सारे जेवर पहनाये गए. वो बरसात की उमस भरी गर्मी. लोग कहते हैं..”पहनी ओढ़ी हुई नई दुल्हन कितनी सुन्दर लगती है”….जरा उस दुल्हन से भी पूछे कोई…उनलोगों का बेहोश ना हो जाना किसी चमत्कार से कम नहीं.

खैर हम भी ये सब पहन-ओढ़ कर एक कार में रवाना हुए. तब तो वहाँ ए.सी.कार भी नहीं थी. पर खिड़की से आती हवा भी ज्यादा राहत नहीं दे पा रही थी क्यूंकि सर पर भारी साड़ी का पल्लू था. जब वहाँ पहुँच कर कार रुकी और सब तो उतर गए पर मेरे पैर के बिछुए साड़ी की रेशमी धागे में फंस गए थे. किसी तरह छुड़ा कर नीचे उतरी तो बगल में खड़ी अम्मा जी ने जल्दी से आगे बढ़कर घूँघट खींच दिया, अब मुझे कुछ दिखाई ही ना दे .बुत बनी खड़ी रही.

आगे बढूँ कैसे….लगा गिर जाउंगी. ननद की बेटी ने कुहनी थाम कर सहारा दिया…एक हाथ से सर पर साड़ी संभाला तो इस बार साड़ी मांग टीका में उलझ गयी…सीमा ने छुड़ाया .फिर तो वो कार से घर के दरवाजे की दस कदम की दूरी दस किलोमीटर जैसी लगी…एक कदम बढाऊं और साड़ी के धागे, कंगन में फंस जाए….वहाँ से छुड़ा कर आगे बढूँ …तो कभी नेकलेस में…कभी पायल में फंस जाएँ. आवाज़ से लग रहा था…आस-पास काफी लोग हैं…और सबकी नज़र शायद मुझपर ही है…पर मेरी नज़र तो बस उस एक टुकड़े जमीन पर थी जो घूँघट के नीचे से नज़र आ रहा था…उसी जमीन के टुकड़े पर किसी तरह पैर संभाल कर रखते हुए आगे बढ़ रही थी. घर के अंदर आकर सीमा ने जरा पल्ला सरका दिया तो राहत मिली. चारो तरफ नज़र घुमा कर जायजा ले ही रही थी बरामदे में जल्दी से एक चटाई बिछा दी गयी और मुझे उस पर बैठने को कहा गया. जैसे ही मैं बैठी.. कि एक तरफ से आवाज़ आई..”अच्छा तो ई हथिन नईकी कनिया…” अम्मा जी कहीं से तो आयीं और इस बार तो मेरा घूँघट , घुटने तक खींच दिया…अब तो लगे,दम ही घुट जाएगा…कुछ नज़र भी नहीं आ रहा था.

बैठे-बैठे मुझे ‘गुनाहों का देवता’ पुस्तक याद आ रही थी. जिसमे सुधा ने अपनी शादी में घूँघट करने से मना कर दिया था और मैं सोच रही थी…मुझमे जरा भी हिम्मत नहीं है. लोग जैसा कह रहे हैं…चुपचाप किए जा रही हूँ {आपलोगों को भी विश्वास नहीं हो रहा ना…मुझे भी अब नहीं होता :)} खुद को ही कोसे जा रही थी..पर अब लिखते वक़्त ध्यान आ रहा है..धर्मवीर भारती ने इस घटना का जिक्र सुधा के मायके में किया है. जहाँ उसके आस-पास उसके अपने लोग थे. ससुराल में सुधा को घूँघट के लिए कहा गया या नहीं…या सुधा की क्या प्रतिक्रिया रही…इन सबका जिक्र उपन्यास में नहीं है. अगर होता भी तो वहाँ नायक…नायिका के बचाव के लिए आ जाता. वो ही अपनी तरफ से मना कर देता.
पर यहाँ मेरे नायक महाशय तो बाहर बैठे लोगो के साथ लफ्ज़ी गुलछर्रे उड़ाने में मशगूल थे. और मैं सोच रही थी…पुरुषों के लिए कभी कुछ नहीं बदलता. ये मेरे घर जाते हैं…वहाँ भी यूँ ही सबके साथ बैठे हंस -बोल रहे होते हैं….और यहाँ अपने घरवालों के साथ भी…सिर्फ हम स्त्रियों को ही ये सब भुगतना पड़ता है. पता नहीं किसने पहली बार ये ‘घूँघट ‘ जैसी चीज़ ईजाद की. वर्ना अपनी सीता..शकुंतला तो कभी घूँघट में नहीं रहीं.
यूँ ही बैठी खीझ रही थी कि चिड़ियों की तरह चहचहाता लड़कियों का एक झुण्ड आया….और मुझे घेर कर बैठ गया…उन लड़कियों ने ही घूंघट हटा दिया…थोड़ी राहत मिली…पहली बार काकी-चाची-मामी जैसे संबोधन सुनने को मिले. उनसे बातें कर ही रही थी…कि दो बच्चे बाहर से भागते हुए आए और कहा…बाहर पेड़ पर झूला लगा हुआ है…..सारी लड़कियां उठ कर भागीं…और मुझे एक धक्का सा लगा…’अब मेरे ये दिन गए” 😦 .
कुछ ही मिनटों बाद एक बूढी महिला ने आकर कहा…”घूँघट कर लो…कुछ गाँव की औरतें सामने खड़ी हैं.” लो भाई हम फिर से कैद हो गए और बाहर की दुनिया हमारे लिए बाहर ही रह गयी….पर मेरे बचाव को आयीं मेरी एक जिठानी..नीलू दीदी…आते ही उन्होंने बिलकुल पल्ला सर से काफी नीचे खींच दिया…और पूछा…”तुम्हे गर्मी नहीं लगती…??”

मैं क्या कहती…मुस्कुरा कर रह गयी. अब चारो तरफ देखने का मौका मिला…बड़ा सा आँगन था और आँगन को चारों तरफ से घेरे हुए चौड़े बरामदे. कहीं-कहीं बरामदे का छप्पर टूट गया था और…सूरज की तेज रौशनी सीधी जमीन पर पड़ रही थी. बरामदे के कोनो में चूल्हे जले हुए थे और उस पर पूजा में चढ़ाए जाने को पकवान बन रहे थे. कई सारे चूल्हे एक साथ जल रहे थे…थोड़ी हैरानी हुई…पर समझ में आ गया. हर परिवार अलग-अलग पकवान बना रहा है..पर पूजा सम्मिलित रूप से होगी. एक जगह एक जिठानी…चूल्हे में फूंक मारती पसीने से तर बतर हो रही थीं…पर आग जल नहीं रही थीं…और उन्होंने जोर की आवाज़ अपने पति और बच्चों को लगाई..”मैं यहाँ मर रही हूँ…आपलोग बाहर बैठे गप्पे हांक रहे हैं” पति-बच्चे भागते हुए आए…और कोई चूल्हे में फूंक मारने लगा…कोई पंखे से हवा करने लगा…तो कोई चूल्हे में अखबार डालकर लकड़ियों को जलाने की कोशिश करने लगा….आज का दिन होता तो जरूर एक फोटो ले लेती…उस समय बस एक मुस्कराहट आ गयी…पूरे परिवार का मिटटी के चूल्हे की खुशामद में यूँ जुटा देख.
पर मुस्कान को तुरंत ही नज़र लग गयी…और फिर से अम्मा जी आयीं और घुटनों तक घूँघट खींच दिया…” बस एक दिन की तो बात है…गाँव का यही रिवाज़ है…”
रिवाज़ से ज्यादा यह दिखाने की चाह होती है कि शहर की हुई तो क्या…मेरी बहू सारी परम्पराएं निभाती है.
पुनः बाहर की दुनिया मेरी नज़रों से बाहर हो गयी. कोई सिद्ध आत्मा होती तो बाहर की दुनिया यूँ बंद हो जाने पर….मौके का फायदा उठा अपने भीतर झाँकने की कोशिश करती….पर मैं अकिंचन तो कुढ़ कुढ़ कर ये कीमती वक़्त बर्बाद कर रही थी.
पूरे दिन ये सिलिसला चलता रहा…नीलू दी आतीं और डांट कर मेरा पल्ला पीछे खींच जातीं..अम्मा जी आतीं और वो नीचे खींच देतीं.
(आज वे दोनों इस दुनिया में नहीं हैं…पर उनकी ये यादें साथ बनी हुई हैं….ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे)

घूँघट, मुज़फ्फरपुर(बिहार).संस्मरण, श्रावणी पूजा में प्रकाशित किया गया | 41 टिप्पणियाँ

हैप्पी बर्थडे सीमा..:)

पता नहीं कितने लोगो को कहते सुना ..मेरा बरसो पुराना फ्रेंड फेसबुक या नेट के माध्यम से मिला/मिली …और मैं खीझ कर रह जाती…मुझे तो मेरी कोई फ्रेंड मिलती ही नही…अधिकाँश फ्रेंड्स की तो शादी के बाद सरनेम चेंज हो गए होंगे…इसलिए नहीं मिलती…पर सीमा…सीमा, क्यूँ नहीं मिलती??…उस से तो उसकी शादी के बाद भी मुलाकात होती रही….बस पिछले 12 बरस से बिछड़ गए हैं हम…उसके पति का सरनेम भी पता है..फिर भी ना तो वो नेट पर मिलती ना ही फेसबुक पर. ब्लॉग पर भी कभी पोस्ट में कभी टिप्पणियों में उसके शहर उसकी कॉलोनी का जिक्र कर देती हूँ …कि कोई पहचान वाला पढ़े तो शायद मदद कर सके… समस्तीपुर वालों से तुरंत दोस्ती का हाथ बढ़ा देती हूँ ….शायद वे जानते हों…पर हर बार निराशा ही हाथ लगी.


सीमा ,कॉलेज के दिनों की मेरी बेस्ट फ्रेंड थी…जबकि हम एक साथ कभी पढ़े भी नहीं. पर उन दिनों वो ही मेरी बेस्ट फ्रेंड थी. उस से दोस्ती का किस्सा भी बड़ा अजीब है. बारहवीं के बाद मैने घर में ऐलान कर दिया था कि मैं अब हॉस्टल में रहकर नहीं पढूंगी…बल्कि समस्तीपुर में ही पढूंगी(जहाँ पापा कि पोस्टिंग थी) . मम्मी-पापा ने समझाया..’ठीक है..पहले जाकर कॉलेज देख लो…अगर अच्छा लगे तो यहीं पढना” और मैं अपने पड़ोस में रहनेवाली एक लड़की के साथ वहाँ के विमेंस कॉलेज गयी. वहीँ पर मेरी मुलाकात सीमा से हुई और हमारी तुरंत दोस्ती हो गयी…करीब एक हफ्ते तक कॉलेज जाती रही…हम साथ लौटते…एक गली मेरे घर की तरफ मुड जाती…और सीमा कुछ और लड़कियों के साथ सीधी चली जाती. एक हफ्ते में ही मैने निर्णय ले लिया कि नहीं हॉस्टल में रहकर ही पढूंगी. सीमा से मुलाकात भी ख़त्म हो गयी. मेरा एडमिशन हो गया…और सरस्वती पूजा के बाद मुझे हॉस्टल जाना था. सरस्वती पूजा के दिन…सीमा मेरा घर ढूँढती हुई मुझसे मिलने आई…फिर तो हम साथ घूमने चले गए…उसके बाद से ही अक्सर हमारी शामें,एक दूसरे के घर के छत पर गुजरने लगीं.

उन दिनों हमारी दुनिया थी…किताबें..पत्रिकाएं…फिल्मे ,क्रिकेट और जगजीत सिंह की गज़लें.. फिल्म हम साथ देखते…किसी पत्रिका में कोई कहानी पढ़ लेते तो दूसरे के लिए रख देते और जब उस कहानी की बातें करते तो पता चलता…हम दोनों को वो ही अंश पसंद आए हैं. एक ने जो किताब पढ़ी..दूसरे को पढवाना अनिवार्य था. एक शाम,सीमा…एक मोटी सी किताब लेकर आई जिसमे अमृता प्रीतम की तीन लम्बी कहनियाँ…कुछ छोटी कहानियाँ और कुछ कविताएँ संकलित थीं. किताब देखकर मुझे हर्ष और विषाद एक साथ हुआ…दूसरे दिन ही मुझे हॉस्टल जाना था. पर सीमा ने ताकीद कर दी…पूरी किताब ख़त्म करनी ही है…हम इन कहानियों पर बातें करेंगे. मेरी रूचि तो थी ही…और पूरी रात जागकर मैने वो सारी कहानियाँ पढ़ीं (उनमे अमृता प्रीतम की मशहूर कहानियाँ .. पिंजर और नागमणि भी थी) .

सीमा की प्रतिक्रिया देखकर ही मुझे ये पता चला…’हर उम्र पर किताबो का असर अलग रूप में होता है” मैने नवीं कक्षा में ‘गुनाहों का देवता ‘पढ़ी थी ..और आज तक…वही असर है..पर सीमा को शायद बी.ए. फाइनल इयर में मैने उसके जन्मदिन पर ‘गुनाहों का देवता’ दी थी…उसे अच्छी लगी..पर उतनी नहीं, जितनी मुझे लगी थी. मेरे भी हर जन्मदिन पर सुबह-सुबह….कोहरे में लिपटी दो दो स्वेटर पहने..मोज़े जूते स्कार्फ से लैस. (क्यूंकि पूरा जाड़ा…उसका सर्दी-जुकाम-बुखार से लड़ते गुजरता )सीमा, अमृता-प्रीतम..मोहन राकेश की कोई किताब लिए मेरे घर हाज़िर हो जाती. उन दिनों..हमें ‘ Pride and Prejudice ” Wuthering Hights ‘बहुत अच्छे लगते . Erich Segal की Love Story तब भी हम दोनों को उतनी अच्छी नहीं लगी थी…जबकि वो अंग्रेजी की ‘गुनाहों का देवता’ है.
उन दिनों मैने कहानियाँ लिखना शुरू कर दिया था…और सीमा उनकी पहली पाठक ही नहीं…जबरदस्त आलोचक की भूमिका भी निभाती. {याद नहीं कभी तारीफ़ किया हो..:( }

हॉस्टल में भी लम्बे लम्बे ख़त के सहारे हम साथ बने रहते. कभी-कभी छुट्टियों में मुझे दादाजी गाँव ले जाते ..जहाँ टी.वी. था तो सही..पर बैटरी पर चलता…सिर्फ रविवार को रामायण और फिल्म ही देखे जाते. क्रिकेट मैच के दिनों में एक-एक मैच के हाइलाइट्स सीमा मुझे लिख भेजती. सुनील गावस्कर की आत्मकथा ‘सनी डेज़’ हम दोनों ने साथ पढ़ी थी. और ऐसे कितनी ही बहस हो जाए..पर सुनील गावस्कर और रवि शास्त्री हम दोनों के ही फेवरेट थे {मेरे तो आज भी हैं…सीमा का नहीं पता :)}
वैसे ही फेवरेट थे जगजीत सिंह…उन दिनों कैसेट का जमाना था…. “बात निकलेगी तो दूर…” कल चौदवीं की रात थी…’ देश में निकला होगा चाँद…” हम पता नहीं कितनी बार रिवाइंड करके सुनते….उस ढलती शाम में गूंजता..जगजीत सिंह का उदास स्वर हमें कहीं भीतर तक उदास कर जाता…जबकि वजह कोई नहीं होती.

पर कुछ मामलो में सीमा बहुत बेवकूफ थी. उसने दसवीं में पढ़ने वाले अपने कजिन को ‘ख़ामोशी’ फिल्म सजेस्ट कर दी..और जब उसे पसंद नहीं आई तो सीमा को बहुत आश्चर्य हुआ. ऐसे ही…उसके घर बोर्ड की परीक्षा देने उसके गाँव से कुछ लडकियाँ आई थीं. ,उनलोगों ने रविवार को टी.वी. पर फिल्म देखने की इच्छा जताई…सीमा ने उनके बैठने की व्यवस्था..बिलकुल टी.वी. के सामने की. पर फिल्म थी, ‘कागज़ के फूल’ कुछ ही देर में उनकी खुसुर पुसुर शुरू हो गयी…और सीमा मैडम नाराज़..”एक तो सामने बैठ गयीं..और अब डिस्टर्ब भी कर रही हैं..इतनी अच्छी फिल्म उन्हें कैसे अच्छी नहीं लगी.” यह बात उसे समझ में नहीं आती ..कि सबका लेवल अलग होता है…:)

बाज़ार से मुझे या सीमा को कुछ भी लाना हो..हम साथ जाते…और आने-जाने के लिए सबसे लम्बा-घुमावदार रास्ता चुनते..जाने कैसी बातें होती थीं ..जो ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेतीं. सीमा को कॉलेज में कुछ काम होता और मैं शहर में होती तो हम साथ ही जाते उसके कॉलेज…पर कॉलेज में नहीं रुकते….उन दिनों कैफे….मैक डोनाल्डस तो थे नहीं…जहाँ समय गुजारे जा सकते. कॉलेज के पास एक निर्माणधीन मकान के अंदर जाकर कभी उसकी सीढियों पर बैठते तो कभी..उस घर के किचन की प्लेट्फौर्म पर. रेत-पत्थर -इंटों के ढेर के बीच…और हमें डर भी नहीं लगता…उस घर में एक तरफ मजदूर काम कर रहे होते…और एक तरफ हम बैठे अपनी बातों में मशगूल. अब सोच कर ही डर लगता है…अब शायद ही ऐसे माहौल में लडकियाँ सुरक्षित महसूस करें, खुद को….क्या होता जा रहा है,हमारे समाज को.

सीमा की शादी बहुत जल्दी हो गयी…और घर में शादी की बातचीत उस से भी पहले से शुरू हो चुकी थी. ऐसे में सीमा…सीधा मेरे घर आ जाती. पीछे से उसकी दीदी और कजिन…आतीं तब मुझे पता चलता..’मैडम घर से नाराज़ होकर आई है’ जाहिर है..इतनी जल्दी शादी की उसकी मंशा नहीं थी….पढ़ने में बहुत तेज थी..अपने कॉलेज की प्रेसिडेंट भी थी. दूसरे कॉलेज में किसी प्रोग्राम के सिलसिले में जाती तो उसकी धाक जम जाती. सारे लोग उसे पहचानते थे. मेरे पड़ोस में रहने वाली लड़की तो इसी बात पर इतराए घूमती और अपनी सहेलियों पर रौब जमाती कि उसके पड़ोस में ‘सीमा’ का आना जाना है. मैं, जब दुसरो से उसकी तारीफ़ सुनती तो पलट कर सीमा को एक बार देखती..’मुझे तो उसमे ऐसा कुछ ख़ास दिखता नहीं….किस बात की तारीफ़ करते हैं लोग.’ 🙂

समस्तीपुर से पापा का ट्रांसफर हो गया..मैं एम.ए करने पटना चली आई..सीमा ससुराल चली गयी. एक दिन मैं मनोयोग से लेक्चर सुन रही थी..और देखती क्या हूँ..मेरी क्लास के सामने सीमा अपने पतिदेव के साथ खड़ी है. एम.ए में थी..पर फिर भी कभी लेक्चर के बीच में क्लास छोड़ बाहर नहीं निकली थी. पहली बार बिना..प्रोफ़ेसर से कुछ पूछे बाहर आ गयी…और फिर थोड़ी देर में अपनी किताबें भी उठा कर ले आई. इसके बाद तो सीमा को जब भी मौका मिलता…मुझसे मिल जाती. मैं बनारस में अपनी मौसी के यहाँ थी…वहाँ, सीमा के डॉक्टर पति का कोई कॉन्फ्रेंस था..वो उनके साथ,अपने छोटे से बेटे को लेकर मुझसे मिलने चली आई. मेरी शादी में भी…अपनी छः महीने की बेटी को अपनी माँ के पास छोड़कर शामिल हुई थी.

पापा भी रिटायरमेंट के बाद पटना में आ गए थे. और सीमा अब पटना के एक स्कूल में बारहवीं कक्षा को पढ़ाती थी. शादी के बाद उसने बी.ए.,..एम.ए…..बी.एड. और पी.एच .डी. भी किया. सिविल सर्विसेज़ का प्रीलिम्स भी क्वालीफाई किया. am really proud of her 🙂 .पर वो समझ गयी थी कि mains नहीं कर पाएगी…क्यूंकि ससुराल में घर का काम….दो छोटे बच्चों की देखभाल के साथ मुमकिन नहीं था.

फिर तो, मैं जब भी गर्मी छुट्टियों में पटना जाती..पहला फोन सीमा को ही घुमाती. और हम मिलते रहते. करीब बारह साल पहले… गर्मी छुट्टी में पटना गयी तो आदतन फोन लगाया..बट नो रिस्पौंस…सीमा के स्कूल गयी…वहाँ ऑफिस में किसी ने बताया..”उनका तो स्थानान्तरण हो गया’ मुम्बइया भाषा के आदी कान को…ये समझने में ही दो मिनट लग गए. उनके पास सीमा का कोई कॉन्टैक्ट नंबर नहीं था और गर्मी छुट्टी की वजह से स्कूल बंद था..प्रिंसिपल,किसी टीचर से मिलना मुमकिन नहीं था. पटना में पापा ने भी नया घर ले लिया था ….मुंबई में हमने भी फ़्लैट ले लिया था. सबके फोन नम्बर बदल चुके थे. मुझे पता था, सीमा ने कोशिश की होगी..पर कहाँ ढूँढती हमें. और मैने सोचा लिया…”अब तक वो मुझे ढूँढती आई है…’इस बार सीमा को मुझे ढूंढना है.”

ऑरकुट पर मिली बेटे के साथ सीमा की फोटो जिसमे मैने उसे नहीं पहचाना


मैं कोशिश करती रहती. हर कुछ दिन बाद मैं उसका नाम लिख एक बार एंटर मार लेती…..पता नहीं कितनी सीमा के चेहरे की रेखाएं गौर से पढ़ने की कोशिश करती. और कामयाबी मिली कल..एक अक्टूबर को. उसके नाम के साथ जुड़ा था…प्रिंसिपल ऑफ़ कॉलेज…… {कॉलेज का नाम नहीं लिख रही…उसका कोई स्टुडेंट ना पढ़ ले, ये सब :)} पर इस से ज्यादा कोई इन्फोर्मेशन नहीं मिली. पर नीचे एक वेबसाईट का लिंक मिला..जिसमे परिचय में लिखा था.. son of Dr Rajkumar and Dr . Seema …early education in Darbhanga . दरभंगा सीमा की ससुराल थी.. अब इतने संयोग तो नहीं हो सकते. मैने जैसे ही नाम पढ़ा..याद आ गया…’सीमा के बेटे का नाम ‘ऋषभ’ है. पर कन्फर्म कैसे हो…ये सीमा का ही बेटा है. उसके ऑर्कुट प्रोफाइल का लिंक था. वहाँ फोटो में ढूँढने की कोशिश कि. एक फोटो थी माँ के साथ..पर उसमे सीमा पहचान में नहीं आ रही थी. हाँ, डॉक्टर साहब को जरूर पहचान लिया. ऋषभ का मेल आई डी भी मिल गया..और मैने झट से एक मेल भेज दिया…फिर भी सुकून नहीं आ रहा था…अब नाम पता चल गया तो फेसबुक पर ढूँढने की कोशिश की और पाया…ऋषभ ने माँ के साथ…अपने बचपन की एक तस्वीर लगा रखी है.
सीमा ही थी..:)
मैने सोचा…अब कहाँ वीकेंड में वो रिप्लाय करेगा…दोस्तों के साथ फिल्म देखने..पार्टी करने में बिजी होगा…अब सोमवार को ही reply करेगा . फिर भी सोने से पहले एक बार मेल चेक किया…..और..और ऋषभ का मेल था…जिसमे एक संदेश था…”.. apki timing bhi perfect hai .. Its her birthday tomorrow .. mamma ko bhi apse baat karke utni he khushi hogi i m sure ! 🙂

फेसबुक पर मिली फोटो जिसमें सीमा को पहचानना मुश्किल नहीं था.



सीमा का फोन नंबर भी था…और बारह बजने में बस तीन मिनट शेष थे….फि तो मैने एक पल की देरी नहीं की …बस बर्थडे विश किया और पूछा..पहचाना?…दूसरी तरफ से चीखती हुई आवाज़ आई..”कहाँ थी इतने साल??” सीमा ने आवाज़ पहचान ली…:)

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो सीमा..:):)

ऑर्कुट, फेसबुक, संस्मरण, सीमा प्रधान में प्रकाशित किया गया | 44 टिप्पणियाँ

अशोक कुमार पाण्डेय की कुछ बेहतरीन कविताओं का संकलन ‘लगभग अनामंत्रित ‘


कविता प्रेमियों के लिए ‘अशोक कुमार पाण्डेय’ जाना पहचाना नाम है. ब्लॉगजगत में जिन लोगों की कविताएँ पढ़ती हूँ और जिनकी नई कविता का इंतज़ार रहता है…अशोक जी का नाम उनमे प्रमुख है. उनके ब्लॉग ‘असुविधा’ पर कई कवितायें पढ़ी हैं. कुछ दिनों पहले ही उनका कविता -संग्रह ‘ लगभग अनामंत्रित’ पढ़ने का सुयोग प्राप्त हुआ. इस संकलन की हर कविता नायाब है.


युवा कवि एवं आलोचक महेश चन्द्र पुनेठा जी’ ने अशोक जी की कविताओं के विषय में कहा है...अशोक की कविताओं में काव्यात्मकता के साथ-साथ संप्रेषणीयता भी है। वह जीवन के जटिल से जटिल यथार्थ को बहुत सहजता के साथ प्रस्तुत कर देते हैं।उनकी भा्षा काव्यात्मक है लेकिन उसमें उलझाव नहीं है। उनकी कविताएं पाठक को कवि के मंतव्य तक पहुंचाती हैं। जहां से पाठक को आगे की राह साफ-साफ दिखाई देती है। यह विशेषता मुझे उनकी कविताओं की सबसे बड़ी ताकत लगती है। अच्छी बात है अशोक अपनी कविताओं में अतिरिक्त पच्चीकारी नहीं करते। उनकी अनुभव सम्पन्नता एवं साफ दृष्टि के फलस्वरूप उनकी कविता संप्रेषणीय है और अपना एक अलग मुहावरा रचती हैं।

उनकी कविताएं अपने समय और समाज की तमाम त्रासदियों-विसंगतियों -विडंबनाओं – अंतर्विरोधों -समस्याओं पर प्रश्न खड़े करती है तथा उन पर गहरी चोट करती हैं। यही चोट है जो पाठक के भीतर यथास्थिति को बदलने की बेचैनी और छटपटाहट पैदा कर जाती है। यहीं पर कविता अपना कार्यभार पूरा करती है।

लगभग अनामंत्रित में 48 कविताएं संकलित हैं. इन कविताओं में जीवन की विविधता दिखाई देती है.”

मुझमे कविताओं पर कुछ लिखने की योग्यता नहीं है. बस उन्हें पढना अच्छा लगता है….सोचा एकाध कविताएँ ,यहाँ शेयर की जाएँ.

महेश चन्द्र पुनेठा जी द्वारा इस पुस्तक की विस्तृत समीक्षा यहाँ देखी जा सकती है.

वैसे तो उनकी हर कविता पढ़ कर देखनी चाहिए…इस पते पर यह पुस्तक मंगवाई जा सकती है.
शिल्पायन
10295

लें न. 1 , वेस्ट गोरखपार्क,
शाहदरा, दिल्ली-110032
दूरभाष :011 – 22326078


काम पर कांता

सुबह पांच बजे…


रात
बस अभी निकली है देहरी से
नींद
गांव की सीम तक
विदा करना चाहती है मेहमान को
पर….
साढ़े छह पर आती है राजू की बस !

साढ़े आठ बजे

सब जा चुके हैं !
काम पर निकलने से पहले ही
दर्द उतरने लगा है नसों में
ये किसकी शक्ल है आइने में ?
वर्षों हो गये ख़ुद का देखे हुए
अरे….पौने नौ बज गये !

दस बजे…

कौन सी जगह है यह?
बरसों पहले आई थी जहां
थोड़े से खुले आसमान की तलाश में
परम्परा के उफनते नालों को लांघ
और आज तक हूं अपरिचित !

कसाईघर तक में अधिकार है कोसने का्… सरापने का
पर यहां सिर्फ़ मुस्करा सकती हूं
तब भी
जब उस टकले अफ़सर की आंखे
गले के नीचे सरक रही होती हैं
या वो कल का छोकरा चपरासी
सहला देता है उंगलियां फाईल देते-देते
और तब भी
जब सारी मेहनत बौनी पड़ जाती है
शाम की काॅफी ठुकरा देने पर !

शाम छह बजे…

जहां लौट कर जाना है
मेरा अपना स्वर्ग

इंतज़ार मंे होगा
बेटे का होमवर्क
जूठे बर्तन / रात का मेनू
और शायद कोई मेहमान भी !

रात ग्यारह बजे…

सुबह नसों में उतरा दर्द
पूरे बदन में फैल चुका है
नींद अपने पूरे आवेग से
दे रही है दस्तक
अचानक करीब आ गए हैं
सुबह से नाराज़ पति
सांप की तरह रेंगता है
ज़िस्म पर उनका हाथ

आश्चर्य होता है
कभी स्वर्गिक लगा था यह सुख !


नींद में अक्सर

आज देर से हुई सुबह
नहीं आई राजू की बस
नाश्ता इन्होने बनाया
देर तक बैठी आईने के सामने
नहीं मुस्कराई दफ़्तर में
मुह नोच लिया उस टकले का
एक झापड़ दिया उस छोकरे को
लौटी तो चमक रहा था घर
चाय दी इन्होने
साथ बैठकर खाए सब
आंखो से पूछा
और…. काग़ज़ पर क़लम से लगे उसके हांथ !

“मैं धरती को एक नाम देना चाहता हूँ”


मां दुखी है

कि मुझ पर रुक जायेगा ख़ानदानी शज़रा

वशिष्ठ से शुरु हुआ
तमाम पूर्वजों से चलकर
पिता से होता हुआ
मेरे कंधो तक पहुंचा वह वंश-वृक्ष
सूख जायेगा मेरे ही नाम पर
जबकि फलती-फूलती रहेंगी दूसरी शाखायें-प्रशाखायें

मां उदास है कि उदास होंगे पूर्वज
मां उदास है कि उदास हैं पिता
मां उदास है कि मैं उदास नहीं इसे लेकर
उदासी मां का सबसे पुराना जेवर है
वह उदास है कि कोई नहीं जिसके सुपुर्द कर सके वह इसे

उदास हैं दादी, चाची, बुआ, मौसी…
कहीं नहीं जिनका नाम उस शज़रे में
जैसे फ़स्लों का होता है नाम
पेड़ों का, मक़ानों का…

और धरती का कोई नाम नहीं होता…

शज़रे में न होना कभी नहीं रहा उनकी उदासी का सबब
उन नामों में ही तलाश लेती हैं वे अपने नाम
वे नाम गवाहियाँ हैं उनकी उर्वरा के
वे उदास हैं कि मिट जायेंगी उनकी गवाहियाँ एक दिन


बहुत मुश्किल है उनसे कुछ कह पाना मेरी बेटी
प्यार और श्रद्धा की ऐसी कठिन दीवार
कि उन कानों तक पहुंचते-पहुंचते
शब्द खो देते हैं मायने
बस तुमसे कहता हूं यह बातकि विश्वास करो मुझ पर ख़त्म नहीं होगा वह शज़रा
वह तो शुरु होगा मेरे बाद
तुमसे !


तुम्हारी दुनिया में इस तरह

सिंदूर बनकर
तुम्हारे सिर पर
सवार नहीं होना चाहता हूं
न डस लेना चाहता हूं
तुम्हारे कदमों की उड़ान को

चूड़ियों की जंजीर में
नही जकड़ना चाहता

तुम्हारी कलाईयों की लय
न मंगलसूत्र बन
झुका देना चाहता हूं
तुम्हारी उन्नत ग्रीवा
जिसका एक सिरा बंधा ही रहे
घर के खूंटे से

किसी वचन की बर्फ़ में

नही सोखना चाहता
तुम्हारी देह का ताप

बस आंखो से बीजना चाहता हूं विष्वास
और दाख़िल हो जाना चाहता हूं
ख़ामोशी से तुम्हारी दुनिया में
जैसे आंखों में दाख़िल हो जाती है नींद

जैसे नींद में दाख़िल हो जाते हंै स्वप्न
जैसे स्वप्न में दाख़िल हो जाती है बेचैनी
जैसे बेचैनी में दाख़िल हो जाती हैं उम्मीदें
और फिर
झिलमिलाती रहती है उम्र भर.

अशोक कुमार पाण्डेय, कविता, लगभग अनामंत्रित में प्रकाशित किया गया | 35 टिप्पणियाँ

दो वर्ष पूरा होने की ख़ुशी ज्यादा या गम….

२३ सितम्बर को इस ब्लॉग के दो साल हो गए. पर इस बात की ख़ुशी नहीं बल्कि अपराधबोध से मन बोझिल है.  पिछले साल इस ब्लॉग पर सिर्फ दो लम्बी कहानियाँ और एक किस्त,वाली बस एक कहानी लिखी.

जबकि sept 2009 -sept 2010  के अंतराल में आठ-सोलह-चौदह किस्तों वाली तीन लम्बी कहानियाँ  और चार छोटी कहानियाँ लिखी थीं. मन दुखी इसलिए है कि  ऐसा नहीं कि  प्लॉट   नहीं सूझ रहा…कम से कम पांच-छः प्लॉट और दो लम्बी कहानियाँ अधूरी लिखी पड़ी हुई हैं. पर पता नहीं वक्त कैसे निकल जा रहा है…शायद दूसरे ब्लॉग की सक्रियता कहानियों की राह में रोड़े अटका रही है…एक मित्र से यही बात शेयर की तो उनका कहना था….”कहानियाँ तो खुद को लिखवा ही लेंगी…दूसरे ब्लॉग पर सक्रियता कायम रखें…वो ब्लॉग लोगो को ज्यादा पसंद है..”.. ..हाँ, कहानियाँ शायद लिखवा ही लें खुद को…पर इस अपराधबोध का क्या करूँ…जो जब ना तब मन को सालता रहता है. 
खासकर तब,जब मेरी बहन शिल्पी ने कहा…, “आज भी पहले ‘मन का पाखी’ ही खोल कर देखती हूँ…नई कहानी आई है या नहीं”…और उसने एक बड़ी महत्वपूर्ण बात कही…कि “कहानियाँ, पाठकों की कल्पना को विस्तार देती हैं…वे अपनी दृष्टि  से किसी भी कहानी को देखते हैं..” . कुछ और पाठक हैं..जो यदा-कदा टोकते रहते हैं..’कहानी नहीं लिखी कब से आपने ‘ और मैने सोच लिया….लम्बी कहानियाँ तो जब पूरी होंगी तब होंगी…एक कहानी तो पोस्ट कर दूँ..
और मैने “

हाथों की लकीरों सी उलझी जिंदगी                          ” लिख डाली.

 अब पाठकों को  बता दूँ कि ये कहानी ,जब मैं कॉलेज में थी,तभी लिखा था. दुबारा टाइप करते वक्त कुछ चीज़ें जुड़ गयीं…क्यूंकि हाल-फिलहाल की कहानी हो और टीनेजर्स से जुड़ी  हो तो फिर उसमे मोबाइल और एस.एम.एस. का जिक्र कैसे ना हो. 

मैने समीर जी से वादा भी किया था…कि डा. समीर के नाम के विषय में  पूरी कहानी पोस्ट करने के बाद लिखूंगी. जब मैने यह कहानी लिखी थी तो पात्रों के यही नाम थे. ब्लॉग में पोस्ट करते वक्त मुझे इस बात का ध्यान था कि समीर जी एक नामी ब्लोगर हैं और मेरी कहानियों के पाठक भी. फिर भी मैं यह नाम नहीं बदल पायी. दूसरे कहानी लेखकों का नहीं पता..पर मेरे साथ हमेशा ऐसा होता है कि कहानी के हर पात्र का नाम ही नहीं एक अस्पष्ट सी तस्वीर भी मेरे सामने बन जाती है. ऐसा लगता है..उसे कहीं देखूं तो पहचान लूंगी. और वो नाम…उनका व्यक्तित्व उस कहानी से कुछ ऐसे जुड़ जाते हैं कि फिर उन्हें बदलना मेरे लिए तो नामुमकिन है. आज भी शची-अभिषेक, नेहा-शरद, पराग-तन्वी, मानस-शालिनी .सब जैसे मेरे जाने-पहचाने हैं. प्रसंगवश ये भी बता दूँ कि ये ‘नाव्या’ नाम मैने कहाँ से लिया था??..अमिताभ बच्चन  के छोटे भाई की बेटी का नाम उनके पिता हरिवंश राय बच्चन ने रखा था, ‘नाव्या नवेली’. मैने कहीं ये पढ़ा और ये नाव्या नाम तभी भा गया.
वैसे अब, जब कहानियाँ लिखती हूँ…तो सबसे बड़ी समस्या नामों की  होती है. परिचय का दायरा दिनोदिन विस्तृत होता जा रहा है…और कोई भी परिचित नाम रखने से बचती हूँ. ऐसे में बेटों को कहती हूँ…’जरा अपने सेल की कॉल लिस्ट पढो…वे नाम पढ़ते जाते हैं…और उनमे से ही नाम चुन लेती हूँ..’तन्वी’…मानस’ … ‘पराग’ नाम ऐसे ही चुना था 🙂 


हाथों की लकीरों सी उलझी जिंदगी से जुड़ी कुछ और बातों का जिक्र करने की इच्छा है…ये कहानी शायद मैने बीस साल पहले लिखी थी . {कोई सबूत चाहे तो पन्नो को स्कैन करके भी लगा सकती हूँ..पर एक वादा करना होगा…मेरी लिखावट पर कोई हंसेगा नहीं.,…वैसे इतनी बुरी भी नहीं है कि हँसे कोई ..पर हंसने वालो का क्या पता 😦 } 

ये साधारण सी कहानी है….मैं भी इसे अपनी प्रतिनिधि कहानियों में नहीं गिनती. कई  वर्षों बाद, ‘विक्रम सेठ’ ने  एक महा उपन्यास ” Suitable  Boy  ”  लिखा . इसे Booker’s Prize के लिए भी नामांकित किया गया. कई सारे अवार्ड मिले. मैने भी इस उपन्यास की चर्चा अपनी एक पोस्ट में की थी…जिसमे नायिका बहुत ही कन्फ्यूज्ड है कि वो किस से शादी करे. एक उसका कॉलेज का पुराना प्रेमी है. एक बौद्धिकता के स्तर पर बिलकुल सामान, कवि-मित्र और एक उसकी माँ के द्वारा चुना गया, सामान्य सा युवक जो बुद्द्धिजिवी नहीं है परन्तु अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित है. 

मैने यह पोस्ट लिखने एक बाद अपने एक मित्र से चर्चा की कि मैने भी बरसो पहले एक कहानी लिखी थी…जिसमे नायिका  समझ नहीं पाती कि वो किसे पसंद करती है. (हालांकि दोनों स्थितियों में बहुत अंतर है….मेरी कहानी में  तो प्यार का इजहार ही नहीं हुआ). संक्षेप में उस मित्र को कहानी सुनाई तो उन्होंने कहा कि ” ये कहानी तो बहुत आगे तक बढ़ाई जा सकती है…जिसमे नायिका को तीनो युवक को जानने का अवसर मिलता है..उसके बाद उसे पता चलता है कि किसके लिए उसके दिल में जगह है. मैने उनसे कहा , “ठीक है….यहाँ तक ये कहानी मैने लिखी…अब इस से आगे की आप लिखिए ..एक नया प्रयोग होगा “
{वैसे भी ब्लॉगजगत में बहुत पहले ‘बुनो कहानी ‘ लिखी जाती थी. जिसे दो लोग मिलकर लिखते थे. मैं जब अपनी पहली लम्बी कहानी पोस्ट कर रही थी,तभी किसी ने ये प्रस्ताव रखा था  कि “आप इस कहानी को पूरा कर लीजिये तो दुसरो के साथ मिलकर ‘बुनो कहानी’ ‘ के अंतर्गत एक कहानी लिखिए. उन्होंने कुछ नाम भी सुझाए कि  उनके साथ  मिलकर लिखिए “. तब उन्हें भी पता नहीं था और शायद मुझे भी कि  अभी तो मेरे झोले से ही नई नई कहानियाँ निकलती जा रही हैं..और कुछ निकलने को बेकरार हैं :)}
मेरे मित्र ने  बड़े उत्साह से ‘हाँ’ कहा. लेकिन वे युवा लोग…अभी जिंदगी शुरू ही हुई है…जिंदगी की सौ उलझनें….नौकरी बदल ली…नई नौकरी की डिमांड…और भी बहुत कुछ होगा…ये बात वहीँ रह गयी…वैसे आप सबो को खुला निमंत्रण है…जो भी चाहे इस कहानी को आगे बढ़ा सकता है…:)



सभी पाठकों का बहुत बहुत शुक्रिया …जिन्होंने मेरी कहानियाँ पढ़ीं…और टिप्पणी देकर उत्साह बढाया …मार्गदर्शन भी किया…आशा है आने वाले वर्ष में आप सबो को निराश नहीं करुँगी…और सारी अधूरी कहानियाँ लिख डालूंगी…शुक्रिया फिर से…लगातार दो वर्ष तक साथ बने रहने के लिए…:)

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खेलप्रेमियों का नया चहेता : युवराज वाल्मीकि

इस पोस्ट को कुछ दिनों पहले ही लिखना था..पर अनेकानेक कारणों से वक़्त नहीं मिला…पर देर से ही सही इसे लिखने की तमन्ना जरूर थी.


इंग्लैण्ड के हाथों भारतीय क्रिकेट टीम को मिली करारी हार ने खेल प्रेमियों को व्यथित कर रखा था…ऐसे में मरहम का कार्य किया हॉकी में मिली अनापेक्षित जीत ने. लेकिन इस मरहम का प्रयोग कितने लोग कर पाए…क्यूंकि अधिकाँश लोगो को हॉकी की खबर ही नहीं रहती…ना तो अखबार में इसके चर्चे होते हैं ना ही टी.वी. पर (ब्लॉगजगत में हुई हो तो पता नहीं) .12 सितम्बर 2011 को चीन में एशियन हॉकी चैम्पियंस ट्रॉफी के फाइनल मैच में भारत ने पकिस्तान को 4-2  से हराकर चैम्पियंस ट्रॉफी जीत ली. पर इस मैच का सीधा प्रसारण किसी भी चैनल ने नहीं किया क्यूंकि वे क्रिकेट मैच दिखाने में व्यस्त थे 

भारतीय क्रिकेट टीम, टेस्ट-मैच श्रृंखला….एक-दिवसीय श्रृंखला…T-20  श्रृंखला हार  गयी, पर उसके खिलाड़ी जब भारत लौटे तो हर खिलाड़ी 15 से 20 लाख रुपये कमा चुका था. और यहाँ हमारी हॉकी टीम के खिलाड़ियों की कमाई  थी… 300 रुपये दैनिक भत्ते के हिसाब से कुछ हज़ार रुपये (विशवास नहीं होता..पर मैंने अखबार में यही पढ़ा है) 

जब टीम जीत कर लौटी तो हॉकी फेडरेशन के सेक्रेटरी ने हर खिलाड़ी को इनामस्वरूप पच्चीस हज़ार रुपये देने की घोषणा की. जब खिलाड़ियों ने इतनी कम राशि लेने से इनकार कर दिया और मिडिया ने भी आलोचना की तब डेढ़ लाख रुपये के इनाम की घोषणा की गयी. 
पंजाब सरकार, उड़ीसा सरकार, महाराष्ट्र सरकार ने खिलाड़ियों के लिए इनाम की घोषणा की है लेकिन इस विवाद के बाद. वरना टीम के जीत की खबर सुनते ही किसी ने टीम के लिए किसी इनाम की घोषणा नहीं की. जबकि क्रिकेट टीम को मिली किसी भी जीत पर इनामो की कैसी बारिश की जाती है…यह सब हम हाल के दिनों में देख ही चुके हैं.

                                                              युवराज वाल्मीकि अपनी झोपड़ी में 

मुंबई के युवराज वाल्मीकि भी इस टीम के सदस्य थे और जीत में भी उन्होंने अहम् भूमिका निभाई. उन्हें महाराष्ट्र सरकार ने दस लाख रुपये देने की घोषणा की है. पर जब उनके बारे में पढ़ा तो पता चला वे एक झोपडी में रहते हैं, जिसमे दरवाजे भी नहीं है..और पक्की छत भी नहीं. पर वो झोपडी कप और शील्ड से सजी हुई है. मैने सोचा दस लाख में मुंबई में तो एक फ़्लैट भी नहीं खरीद  सकते वे. खैर..सरकार को थोड़ी शर्म आई है और अब उन्हें मुख्यमंत्री के २% के कोटे से एक फ़्लैट दिया जा रहा है.

इक्कीस वर्षीय युवराज वाल्मीकि की यह सफल यात्रा विश्वास दिलाती है कि कड़ी मेहनत और सच्ची लगन से क्या हासिल नहीं किया जा सकता. मुंबई की मरीन लाइंस में 16/16 की एक झोपडी में युवराज रहते हैं जहाँ पिछले चालीस सालों से बिजली नहीं है. उनके पिता एक ड्राइवर  हैं जिनकी मासिक आय 6000 रुपये है. फिर भी उन्होंने युवराज को कॉलेज में पढ़ने भेजा और कभी हॉकी खेलने से नहीं रोका. बल्कि बढ़ावा ही दिया. 

नौ साल की उम्र में उनके पहले कोच मर्ज़ाबान पटेल ने उनकी प्रतिभा को पहचाना  और उन्हें कोचिंग देनी शुरू की. सत्रह साल की उम्र में वे एयर इण्डिया के लिए खेलने लगे .उसके बाद से धनराज पिल्लै, गेविन फरेरा, जोकेम कारवालो ने उन्हें कोचिंग देनी शुरू की. नेशनल टीम के चयन के लिए कोचिंग कैम्प में 110 खिलाडी थे. उसमे से 18 खिलाड़ियों की सूची में अपना नाम देखकर ही वे खुश थे. पर जब पकिस्तान के साथ खेलते हुए पाकिस्तानी टीम के विरुद्ध उन्हें पेनाल्टी शूट का मौका मिला, तो उन्होंने अपने कोच को निराश नहीं किया और गोल करके भारत को बढ़त दे दी और भारत विजयी रहा. 

अच्छी बात है कि युवराज इस चकाचौंध  से भ्रमित नहीं हुए हैं..और कहते हैं…”अब तो और भी मेहनत करनी है…भारत ओलम्पिक में मेडल ला सका तो मेरा सपना पूरा होगा. “

एक दिलचस्प बात और हुई. युवराज के दादा जी सालो पहले उत्तर-प्रदेश के अलीगढ से मुंबई आए थे. उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे….जो मुंबई में सिर्फ “मराठी माणूस” को ही देखना चाहते हैं..उन दोनों ने भी युवराज वाल्मीकि का सम्मान किया. 

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ज़िन्दगी एक मिस्ले सफ़र है ..

कल सलिल वर्मा जी के ब्लॉग पर उनका, उनकी बिटिया द्वारा लिया गया ख़ूबसूरत साक्षात्कार पढ़ा….और मुझे कुछ याद आया…कि मेरे ब्लॉगजगत में आने के कुछ ही दिनों बाद….कुलवंत हैपी जी ने अपने ब्लॉग पर एक श्रृंखला शुरू की थी…जिसमे वे लोगो के साक्षात्कार लेते थे…उसी क्रम में मुझसे भी कुछ सवाल पूछे थे…{इस ब्लॉगजगत ने सारे शौक पूरे कर दिए…अब वास्तविक दुनिया में तो कोई इंटरव्यू  लेने से रहा..:)}आज जब कई दिनों बाद उसे दुबारा पढ़ा तो लगा…अब दो साल होने को आए हैं..इस ब्लॉगजगत में पर सब वैसा ही है.
ब्लॉगर  मित्र राजेश उत्साही जी ने एक बार मुझसे कहा था कि मैने अपनी पेंटिंग  के विषय में कभी कुछ नहीं लिखा….वैसे तो हर पेंटिंग की अपनी एक कहानी है..पर यहाँ पेंटिंग की शुरुआत  के विषय में बताने का अवसर मिला…और भी मन की कई सारी बातें हैं, जो लगा यहाँ शेयर करनी चाहिए.

प्रस्तुत है वही साक्षात्कार बिना किसी फेरबदल के. 


कुलवंत हैप्पी : आपने अपनी एक पोस्ट में ब्लॉगवुड पर सवालिया निशान लगाते हुए पूछा था कि ब्लॉग जगत एक सम्पूर्ण पत्रिका है या चटपटी ख़बरों वाला अखबार या महज एक सोशल नेटवर्किंग साईट? इनमें से आप ब्लॉगवुड को किस श्रेणी में रखना पसंद करेंगी और क्यों?


रश्मि रविजा : सबसे पहले तो आपको शुक्रिया बोलूं “आपने मेरा नाम सही लिखा है” वरना ज्यादातर लोग ‘रवीजा’ लिख जाते हैं। वैसे I dont mind much ….टाइपिंग मिस्टेक भी हो सकती है, और जहाँ तक आपके सवाल के जबाब की बात है। तो मैं पोस्ट में सब लिख ही चुकी हूँ। हाँ, बस ये बताना चाहूंगी कि ब्लॉगजगत को मैं एक ‘सम्पूर्ण पत्रिका’ के रूप में देखना चाहती हूँ। मेरे पुराने प्रिय साप्ताहिक ‘धर्मयुग’ जैसा हो, जिसमें सबकुछ होता था, साहित्य, मनोरन्जन, खेल, राजनीति पर बहुत ही स्तरीय। और स्तरीय का मतलब गंभीर या नीरस होना बिलकुल नहीं है। वह आम लोगों की पत्रिका थी और उसमें स्थापित लेखकों के साथ साथ मुझ जैसी बारहवीं में पढ़ने वाली लड़की को भी जगह मिलती थी।
मेरा सपना ब्लॉगजगत को उस पत्रिका के समकक्ष देखना है क्यूंकि मैं ‘धर्मयुग’ को बहुत मिस करती हूँ.


कुलवंत हैप्पी : आपके ब्लॉग पर शानदार पेंटिंगस लगी हुई हैं, क्या चित्रकला में भी रुचि रखती हैं?

रश्मि रविजा : वे शानदार तो नहीं हैं पर हाँ, मेरी बनाई हुई हैं। और मैं अक्सर सोचती थी कि अगर मैं कोई बड़ी पेंटर होती तो अपनी ‘चित्रकला’ शुरू करने की कहानी जरूर बताती। अब आपने पेंटिंग के विषय में पूछ लिया है, तो कह ही डालती हूँ। बचपन में मुझे चित्रकला बिलकुल नहीं आती थी। सातवीं तक ये कम्पलसरी था और मैं ड्राईंग के एक्जाम के दिन रोती थी। टीचर भी सिर्फ मुझे इसलिए पास कर देते थे क्यूंकि मैं अपनी क्लास में अव्वल आती थी।


चित्रकला के डर से ही बारहवीं तक मैंने बायोलॉजी नहीं, गणित पढ़ा। पर इंटर के फाइनल के बाद समय काटने के लिए मैंने स्केच करना शुरू कर दिया, क्योंकि तब, खुद को व्यस्त रखने के तरीके हमें खुद ही इजाद करने पड़ते थे। आज बच्चे, टीवी, कंप्यूटर गेम्स, डीवीडी होने के बावजूद अक्सर कह देते हैं। “क्या करें बोर हो रहें हैं,” पर तब हमारा इस शब्द से परिचय नहीं था। कुछ भी देख कर कॉपी करने की कोशिश करती. अपनी फिजिक्स, केमिस्ट्री के प्रैक्टिकल्स बुक के सारे खाली पन्ने भर डाले। मदर टेरेसा, मीरा, विवेकानंद, सुनील गावस्कर…के अच्छे स्केच बना लेती थी.

फिर जब एम.ए. करने के लिए मैं होस्टल छोड़ अपने चाचा के पास रहने लगी तो वहाँ कॉलेज के रास्ते में एक पेंटिंग स्कूल था। पिताजी जब मिलने आए तो मैंने पेंटिंग सीखने की इच्छा जताई, पर बिहार में पिताओं का पढ़ाई पर बड़ा  जोर रहता है। उन्होंने कहा,’एम.ए.’ की पढ़ाई है, ध्यान से पढ़ो। पेंटिंग से distraction हो सकता है ,पर रास्ते में वह बोर्ड मुझे, जैसे रोज बुलाता था और एक दिन मैंने चुपके से जाकर ज्वाइन कर लिया। हाथ खर्च के जितने पैसे मिलते थे, सब पेंटिंग में लग जाते। उस दरमियान अपने लिए एक क्लिप तक नहीं ख़रीदा. कभी कभी रिक्शे के पैसे बचाकर भी पेंट ख़रीदे और कॉलेज पैदल गई…पर जब पापा ने मेरी पहली पेंटिंग देखी तब बहुत खुश हुए।

ये सारी मेहनत तब वसूल हो गई, जब दो साल पहले मैं अपनी एक पेंटिंग फ्रेम कराने एक आर्ट गैलरी में गयी…और वहाँ SNDT कॉलेज की प्रिंसिपल एक पेंटिंग खरीदने आई थी। उन्हें मेरी पेंटिंग बहुत पसंद आई और उन्होंने मुझे अपने कॉलेज में ‘वोकेशनल कोर्सेस’ में पेंटिंग सिखलाने का ऑफर दिया। मैं स्वीकार नहीं कर पाई, यह अलग बात है क्यूंकि मेरा बडा बेटा दसवीं में था। शायद ईश्वर की मर्जी है कि मैं बस लेखन से ही जुड़ी रहूँ।

कुलवंत हैप्पी : लेखन आपका पेशा है या शौक, अगर शौक है तो आप असल जिन्दगी में क्या करती हैं?
रश्मि रविजा : लेखन मेरा शौक है। मैं मुंबई आकाशवाणी से जुड़ी हुई हूँ। वहाँ से मेरी वार्ताएं और कहानियाँ प्रसारित होती हैं। और असल ज़िन्दगी में, मैं क्या क्या करती हूँ, इसकी फेहरिस्त इतनी लम्बी है कि आप बोर हो जाएंगे, सुनते सुनते 🙂

कुलवंत हैप्पी : आपकी नजर में ब्लॉगवुड में किस तरह के बदलाव होने चाहिए?
रश्मि रविजा : व्यर्थ के विवाद ना हों, सौहार्दपूर्ण माहौल हमेशा बना रहें। कोई गुटबाजी ना हो. सबलोग सबका लिखा पढ़ें और पसंद आने पर खुलकर प्रशंसा-आलोचना  करें। हाँ एक और चीज़…लोग अपना ‘सेन्स ऑफ ह्यूमर’ जरा और विकसित कर लें तो अच्छा…कई बात मजाक समझ कर छोड़ देनी चाहिए..उसे भी दिल पे ले लेते हैं।

कुलवंत हैप्पी : क्या आप आपकी नजर में ज्यादा टिप्पणियोँ वाले ब्लॉगर ही सर्वश्रेष्ठ हैं या जो सार्थक लिखता है?
रश्मि रविजा : ऐसा नहीं है कि ज्यादा टिप्पणियाँ पाने वाले ब्लॉगर सार्थक नहीं लिखते। यहाँ पर कुछ ऐसे लोग भी  हैं, जो बहुत अच्छा लिखते हैं, लेकिन उनको टिप्पणियाँ ना के बराबर मिलती है। ऐसे में उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए।


कुलवंत हैप्पी : “मन का पाखी” में आपने नए साल पर उपन्यास लिखना शुरू किया है, क्या आप अब इस ब्लॉग पर निरंतर उपन्यास लिखेंगी?
रश्मि रविजा : सोचा तो कुछ ऐसा ही है कि अपने लिखे, अनलिखे, अधूरे सारे उपन्यास और कहानियां, सब अपने इस ब्लॉग में संकलित कर दूंगी। ज्यादा लोग पढ़ते नहीं या शायद पढ़ते हैं, कमेंट्स नहीं करते। पर मेरा लिखा सब एक जगह संग्रहित हो जाएगा। इसलिए जारी रखना चाहती हूँ, ये सिलसिला।

कुलवंत हैप्पी : आपको ब्लॉगवुड की जानकारी कैसे मिली, और कब शुरू किया?
रश्मि रविजा : ‘अजय ब्रह्मात्मज’ जी के मशहूर ब्लॉग “चवन्नी चैप” के लिए मैंने हिंदी टाकिज सिरीज के अंतर्गत हिंदी सिनेमा से जुड़े अपने अनुभवों को लिखा था। लोगों को बहुत पसंद आया। कमेन्ट से ज्यादा अजय जी को लोगों ने फोन पर बताया और उन्होंने मुझे अपना ब्लॉग बनाने की सलाह दे डाली। ‘मन का पाखी’ मैंने 23 सितम्बर 2009को शुरू किया और ‘अपनी उनकी सबकी बातें’ 10 जनवरी 2010को.

कुलवंत हैप्पी : “मंजिल मिले ना मिले, ये गम नहीं, मंजिल की जुस्तजू में, मेरा कारवां तो है” आप इस पंक्ति का अनुसरण करती हैं?
रश्मि रविजा : ऑफ कोर्स, बिलकुल करती हूँ। सतत कर्म ही जीवन है, वैसे अब यह भी कह सकती हूँ “तलाश-ओ-तलब में वो लज्ज़त मिली है….कि दुआ कर रहा हूँ, मंजिल ना आए”।

कुलवंत हैप्पी : कोई ऐसा लम्हा, जब लगा हो बस! भगवान इसकी तलाश थी?
रश्मि रविजा : ना ऐसा नहीं लगा, कभी…क्योंकि कुछ भी एक प्रोसेस के तहत मिलता है, या फिर मेरी तलाश ही अंतहीन है, फिर से मंजिल से जुड़ा एक शेर ही स्पष्ट कर देगा इसे “मेरी ज़िन्दगी एक मिस्ले सफ़र है …जो मंजिल पर पहुंची तो मंजिल बढा दी.”

आपका बहुत बहुत शुक्रिया…मुझे इतने कम दिन हुए हैं, ब्लॉग जगत में फिर भी…मेरे विचार जानने का कष्ट किया और मेरे बारे में जानने की जिज्ञासा जाहिर की। आपने कहा था, जिस सवाल का जबाब ना देने का मन हो, उसे छोड़ सकती हूँ। पर देख लीजिए मैंने एक भी सवाल duck नहीं किया। आपके सवालों से तो बच जाउंगी पर ज़िन्दगी के सवाल से भाग कर कहाँ जाएंगे हम?


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